पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/११७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका १२० होनेपर भी मानरहित हैं, जिनके लाल-लाल चरण-कमलोंसे प्रकट हुए मन्दाकिनी (गङ्गाजी ) रूपी मकरन्दका मुनिरूपी भौरे सदा पान करते हैं ॥३॥ जो इन्द्रसे भेजे गये भीषण कामदेवके मद- का मर्दन करनेवाले, क्रोधरहित, शुद्ध बोधस्वरूप और ब्रह्मचारी हैं। जिन्होंने अपने सामर्थ्य से बिना ही कल्पान्तके मार्कण्डेय मुनिको दिखाने- के लिये प्रलयकालकी लीला की थी॥ ४॥ जो पवित्र वन, पर्वत और नदियोंसे पूर्ण वदरिकाश्रममें सदा पद्मासन लगाये एकरूपसे ( अटल) विराजमान रहते हैं। जिनका अत्यन्त अनुपम दर्शन सिद्ध, योगीन्द्र और देवताओंको भी आनन्द और कल्याणका देनेवाला है।॥५॥ हे विश्वम्भर! वहाँ आपके बदरिकाश्रमकेमार्गमें मनभंग' नामक पर्वत है, (जिसे देख- कर लोग आगे बढ़नेसे हिचकते हैं) और यहाँ मेरे हृदयमें अभिमान- रूपी मनभंग है, (जिससे साधनका उत्साह भङ्ग हो जाता है) वहाँ 'चित्तभङ्ग पर्वत है, तो यहाँ मद ही चित्तभङ्गका काम करता है। वहॉ जैसे कठिन-कठिन पर्वत हैं तो यहॉ काम-लोभादि कठिन पर्वत हैं। (वहाँ जैसे हिंसक पशु आदि बड़े विघ्न हैं तो) यहाँ राग, द्वेष, मत्सर आदि अनेक बडे-बडे विघ्न हैं, जिनमेंसे प्रत्येक बड़ा निर्दय और कुटिल कर्म करनेवाला है॥६॥ यहाँ कामिनीकी अत्यन्त बाँकी चितवन ही छरेकी भयङ्कर धार और कामका विष ही तलवारकी तेजधार है जो बड़े- बड़े धीर और गम्भीर पुरुषोंके मनको भी पीड़ा पहुंचानेवाला है, फिर हम-सरीखे निर्वलोकी तो गिनती ही क्या है ॥७॥हे नाथ ! प्रथम तो यह आपके दर्शनका मार्ग ही बड़ा कठिन है, फिर दुष्ट और नीचोंका (मेरा ) साथ हो गया है, सहारेके लिये हाथमें वैराग्यरूपी लकड़ी भी नहीं है। यह दास आपके दर्शनके लिये घबरा रहा है, परन्तु मायाके