पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१२३

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विनय पत्रिका १२६ ( वज्र-अङ्कशादि ) शुभ चिह हैं, अंगुलियों और नोंकी ऐसी अति अभूतपूर्व उपमा है मानो लाल और नीले कमलोंसे रखयुक्त पत्तोंका समूह निकला हो ॥ ३ ॥ सोनेके रताजहित नूपुर मनको मोहनेवाले और भक्तोंको सुख देनेवाले हैं, मानो शिवजीके हृदयमें अनेक रूप धारण करके भगवान् विष्णु सुन्दर मन्दिर बनाकर वास कररहेहो॥४॥ कमरमें जो तागडीका सुन्दर शब्द हो रहा है, वह अनुपम है; उसका वर्णन नहीं हो सकता, (फिर भी ऐसा कहा जासकता है) मानो सोनेके कमलकी सुन्दर कलियोंमें भ्रमरोंका सुहावना शब्द (गुजार) हो रहा हो ॥ ५॥'विशाल वक्षःस्थलमें भृगुमुनिके चरणका चिह अङ्कित होकर आपके वक्षःस्थलकी कोमलता बतला रहा है । करण आदि नाना प्रकारके गहने ऐसे सुन्दर है, मानो ब्रह्माजीने मन लगाकर खयं अपने हाथोंसे बनाये हैं।६॥ गजमुक्ताओंकी मालाके बीचमें रनोंकी चौकी ऐसी शोभा पा रही है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता ( पर समझानेके लिये कहा जाता है कि ) मानो (नीले) मेघपर तारागणोंके मण्डलके बीचमें नवग्रहोंने बैठनेका स्थान बनाया हो । (भाव यह है कि नीले मेधके समान भगवान्का शरीर है, तारागणोंका मण्डल गजमुक्ताओंकी माला है और उसके बीचमें स्थान- स्थानपर पिरोये हुए रंग-बिरंगे रत्न नवग्रहोंके बैठनेका स्थान है) ॥ ७ ॥ सर्पके शरीर-सदृश भुजदण्डोंमें कमल, शख, चक्र और गदा शोभित हो रहे हैं, ग्रीवा सुन्दरताकी सीमा है और ठोड़ी तथा होठोंसहित मुखकी असीम छवि छा रही है ॥ ८॥ दाँतोंकी ओर देखकर हीरे, कुन्दकलियाँ और बिजलीकी चमक लजाती है । नासिका, नेत्र, कपोल, सुन्दर कानोंमें कुण्डल और भौंहें मुझे बहुत