पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१२५

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विनय-पत्रिका १२८ उर वनमाल, पदिक अति सोभित, विप्र-चरन चित का करपे । स्थाम तामरस-दाम-धरन वपु, पीत बसन सोभा यरपै ॥ ४॥ कर कंकन केयूर मनोहर, देरिपरि मोद मुद्रिक न्यारी। गदा कंज दर चारु चक्रधर, नाग-मुंड-सम भुज चारी ॥५॥ कंचुग्रीव, छविसीय विवुक द्विज, अघर अरुन, उन्नत नासा। नवराजीव नयन, ससिमानत,सेवक सुग्वद विसद दासा ॥६॥ रुचिर कपोल, श्रवन कुंडल, सिर मुकुट, सुतिलक भाल भ्राजे। ललितभृकुटि सुंदर चितवनि,कच निरसिमधुप-अवलीलाजै॥७॥ रूप-सील-गुन-खानि दच्छ दिसि, सिंधु-सुता रत-पद-सेवा । जाकी कृपा-कटाच्छचहत सिव,विधि, मुनि,मनुज दनुजादेया॥८॥ तुलसिदास भव-त्रास मिटै तब, जब मति येहि सरूप अटकै। नाहित दीन मलीन हीनसुय, कोटि जनम भ्रमिभ्रमिभटकै ॥९॥ भावार्थ-हे मन ! इस शरीरका परम फल केवल इतना ही है कि नखसे शिखतक सुन्दर अहवाले श्रीविन्दुमाधवजीकी छत्रिका पलभरके लिये अपने चश्चल खभावको छोड़कर स्थिरताके साथ प्रेमसे दर्शन कर ॥ १॥ जिनके कोमल चरण नये खिले हुए लाल कमलके समान हैं, नखोंकी ज्योति हृदयके अज्ञानरूप अन्धकारको हरनेवाली है। जिन चरणों में वन, ध्वजा, जौ और कमल आदिकी सुन्दर रेखाएँ हैं और अङ्कुशका चिह्न मनरूपी हायीको वशमें करनेवाला है॥२॥ पैरोंमें सोनेके रत्नजडित नूपुर और कमरमें तागड़ी मधुर स्वर- से बज रही है । पेटपर तीन रेखाएँ पडी हैं, नाभि सरोवरके समान गहरी है, जहाँसे ब्रह्माजी-सरीखे ज्ञानी उत्पन्न हुए हैं ॥३॥ हृदयपर वनमाला और उसके बीचमें मणियोंकी चौकी अत्यन्त शोभायमान है। भृगुजीके चरणका चिह्न तो चित्तको खींचे लेता है। नीले कमलके