पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१२६

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१२९ विनय-पत्रिका फूलोंकी मालाके समान जिनके शरीरका वर्ण है, उसपर पीताम्बर मानो शोभाकी वर्षा ही कर रहा है ॥ ४ ॥ हाथोंमे मनोहर ककण और बाजूवन्द हैं, अंगूठी निराला ही आनन्द दे रही है । हाथीकी सूंड-सदृश विशाल चारों भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हैं ॥५॥ शङ्ख के समान ग्री। सुन्दरताकी सीमा है। सुन्दर ठोडी, दाँत, लाल होठ और नुकीली नासिका है, नवीन कमलके सदृश नेत्र, चन्द्रमाके समान मुखमण्डल और मृदु मुसुकान भक्तोंको सुख देनेवाली है ॥ ६ ॥ सुन्दर कपोल, कानोंमे कुण्डल, मस्तकपर मुकुट और भालपर सुन्दर तिलक सुशोभित हो रहा है। सुन्दर कटीली भौंहें और मनोहर चितश्न है और जिनके काले केशोंको देखकर भौंरोंकी पंक्ति भी लजित हो रही है ।। ७ ।। रूप, शील और गुगोंकी खानि सिन्धुसुता श्रीलक्ष्मी जी दक्षिणभागमें विराजित होकर चरणसेवा कर रही हैं, जिनकी कृपादृष्टि शिव, ब्रह्मा, मुनि, मनुष्य, देव और देवता भी चाहते हैं ॥ ८ ॥ तुलसीदासका संसारजनित भय तभी मिट सकता है, जब उसकी बुद्धि इस सुन्दर छबिमें अटक जाय । नहीं तो वह दीन, मलीन और सुखहीन होकर करोडों जन्मोंतक व्यर्थ ही भटकता फिरेगा ॥ ९ ॥ राग वसन्त [६४ ] बंदो रघुपति करुना-निधान । जाते छटै भव-भेद-ग्यान ॥१॥ रघुवंस कुमुद-सुखप्रद निसेस । सेवत पद-पंकज अज-महेस ॥२॥ निज भक्त-हृदय-पाथोज-श्रृंग । लावन्यवपुप अगनित अनंग॥३॥ अति प्रवल मोह-तम-मारतंड । अग्यान-गहन-पावक प्रचंड ॥४॥ वि०प० ९.-