पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१३५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका खामी सरवग्य सो चले न चोरी चार की। प्रीति पहिचानि यह रीति दरवारकी ॥४॥ काय न कलेस-लेस लेत मान मनकी । सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जनकी ॥५॥ झेि बस होत, खीझे देत निज धाम रे। फलत सकल फल कामतरु नाम रे॥६॥ वेंचे खोटो दाम न मिले, न राखे काम रे। सोऊ तुलसी निवाज्यो ऐसो राजाराम रे ॥ ७॥ भावार्थ-अरे! तू ऐसे खामीकी सेवासे भी अपना जी चुराता है। तुझमें न तो अपनी समझ है और न तुझे दूसरेके कहेका ही कुछ खयाल है, तू तो किसी भी कामका नहीं, पत्यरका रोड़ा है॥ १ ॥ जो भगवान् श्रीराम मुनियों के मनको भी अगम हैं, वही भक्तोंके लिये माता-पिताके समान सुगम हैं । वे कृपाके समुद्र है, खभावसे ही मित्र और अपने आप ही प्रेम करनेवाले हैं ॥२॥ यह बात लोक और वेदमें प्रसिद्ध है कि श्रीरघुनाथजीसे बड़ा कोई भी नहीं है, वे सर्वदा, सर्वत्र और सभीके साथ रहते हैं ॥३॥ (सच्चे मनसे श्रीरामसे प्रेम कर, क्योंकि ) वे खामी सर्वज्ञ हैं, उनसे सेवककी चोरी छिपी नहीं रह सकती। वहाँ प्रेमकी ही पहचान होती है, यही उनके दरवारकी नीति है ॥ ४ ॥ उनकी सेवामें शरीरको जरा-सा भी कष्ट नहीं पहुँचता, वे खामी मनके प्रेम और सेवाको ही मान लेते हैं। प्रेमसे स्मरण करते ही वे सकोचमें पड़ जाते हैं और सेवककी रुचि देखने लगते हैं,अर्यात भक्तोंको मनमानी वस्तु देकर भी इसी सकोचमें रहते हैं कि हमने कुछ भी नहीं दिया ॥ ५॥