पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१३६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१३९ विनय-पत्रिका वह जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसके वशमे हो जाते हैं और जिसपर नाराज होते हैं उसे ( देहके बन्धनसे छुड़ाकर ) अपने परम धाममें भेज देते हैं । उनका नाम कल्पवृक्षके समान है, जिसमें सब प्रकार- के फल फलते हैं ॥ ६॥ जिसके बेचनेपर एक खोटा पैसा नहीं मिलता और रखनेसे कुछ काम नहीं निकलता, ऐसे तुलसीदासको भी जिन्होंने निहाल कर दिया, ऐसे राजाधिराज श्रीरामजीका क्या कहना है ॥ ७॥ [७२ ] मेरो भलो कियो राम आपनी भलाई । हों तो साई-द्रोही पै सेवक-हित साई ॥१॥ रामसों बड़ो है कौन, मोसों कौन छोटो। रामसोखरो है कौन,मोसों कौन खोटो॥२॥ लोक कहै रामको गुलाम ही कहावौं । एतो बड़ो अपराध भौ न मन वावौं ॥ ३॥ पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यों नीचो। बोरत न वारि ताहि जानि आपुसींचो ॥ ४॥ भावार्थ-श्रीरामजीने अपने भलेपनसे ही मेरा भला कर दिया। ( मेरे कर्तव्यसे भला होनेकी क्या आशा थी १ ) क्योंकि मैं तो खामीके साथ बुराई करनेवाला हूँ परन्तु मेरे खामी श्रीराम सेवक- के हितकारी हैं॥१॥ श्रीरामजीसे तो बड़ा कौन है और मुझसे छोटा कौन है ? उनके समान खरा कोन है और मेरे समान खोटा कौन है-१ ॥२॥ संसार कहता है कि मैं ( तुलसीदास ) रामजीका गुलाम हूँ और मैं भी यह कहलवाता हूँ। ( वास्तवमें रामका सेवक