पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१४२

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१४५ विनय-पत्रिका तरह रखते हैं । यह तो इस लोककी बात हुई, आगे परलोकके लिये तो वेद पुकार ही रहे है कि राम-नामके प्रतापसे तेरा कल्याण हो जायगा । बस, इसीसे मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ॥१॥ पहले मुझे जड़ कोने अहंकाररूपी कठिन वेडियोंसे बाँध लिया था । वह ऐसा भयानक कष्ट था, जो सुननेमें भी बड़ा असह्य है। मैंने दुखी हो पुकारकर कहा, 'हे आर्त और अनाथोंके नाथ ! हे कोसलेश ! हे कृपासिन्धु ! मैं बड़ा कष्ट सह रहा हूँ। ( यह सुनते ही) श्रीरामने मुझ टीनको पापोंसे जलता हुआ देखकर तुरंत कर्मवन्धनसे छुड़ा लिया ॥ २॥ ज्यों ही उन्होंने मुझसे पूछा 'तू कौन है ? त्यों ही मैंने कहा, 'हे नाथ ! मैं आपका दास बनना चाहता हूँ। मेरे कहीं भी और कोई नहीं है, आपके चरणों में पड़ा हूँ।' इसपर भक्तसुखकारी परम गुरु श्रीरामजीने मेरी पीठ ठोंकी, बॉह पकडकर मुझे अपनाया और आश्वासन दिया । तबसे मैं यह ( कण्ठी, तिलक, माला, रामनाम-जप, अहिंसा, अभेद, नम्रता आदि ) भगवान्का वैष्णवी बाना सदा धारण किये रहता हूँ॥ ३ ॥ रामका गुलाम बना देखकर लोग मुझे नीच कहते हैं; परन्तु मुझे इसके लिये कुछ भी चिन्ता या संकोच नहीं है; क्योंकि न तो मुझे किसीके साथ विवाह-सगाई करनी है और न मुझे जाति-पॉतिसे ही कुछ मतलब है । तुलसीका बनना- बिगडना तो श्रीरामजीके रीझने-खीझनेमें ही है । परन्तु मुझे आपके प्रेमपर विश्वास है, इसीसे मैं मनमें सदा सानन्द रहता हूँ॥ ४ ॥ [७७] जानकी-जीवन, जग-जीवन, जगत-हित, । . जगदीस, रघुनाथ, राजीवलोचन राम ।। वि०प०१०-