पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१४८

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- १५१ विनय-पत्रिका भावार्थ-हे परम दयाल श्रीरघुनाथजी ! आप दीनोंके बन्धु, सुखके समुद्र और कृपाकी खानि हैं। हे नाथ ! सुनिये, मेरा मन संसारके त्रिविध तापोंसे जल रहा है अथवा उसे ( काम-क्रोध-लोभ- रूपी) त्रिदोष ज्वर हो गया है और इसीसे वह पागलकी तरह बकता फिरता है ॥ १॥ कभी वह योगाभ्यास करता है तो कभी वह दुष्ट भोगोंमें फँस जाता है। कभी हठपूर्वक वियोगके वश हो जाता है तो कभी मोहके वश होकर नाना प्रकारके द्रोह करता है और वही किसी समय बडी दया करने लगता है ॥२॥ कभी दीन, बुद्धिहीन, बडा ही कंगाल बन जाता है, तो कभी घमण्डी राजा वन जाता है, कभी मूर्ख बनता है, तो कभी पण्डित बन जाता है। कभी पाखण्डी बनता है और कभी धर्मपरायण ज्ञानी बन जाता है ।। ३ ।। हे देव ! कभी उसे सारा जगत् धनमय दीखता है, कभी शत्रुमय और कभी स्त्रीमय दीखता है अर्थात् वह कभी लोभमें, कभी क्रोधमें और कभी काममें फंसा रहता है । यह ससार- रूपी सन्निपात-ज्वरका दारुण दुःख बिना भगवत्कृपाके कभी नष्ट नहीं हो सकता ॥ ४ ॥ यद्यपि संयम, जप, तप, नियम, धर्म, व्रत आदि अनेक ओषधियाँ है; परन्तु तुलसीदासका संसाररूपी रोग श्रीरामजीके चरणोंके प्रेम बिना दूर नहीं हो सकता ॥ ५॥ .[८२] मोहजनितमल लाग बिबिध विधि कोटिहु जतन नजाई। जनम जनम अभ्यास-निरतचित, अधिक अधिकलपटाई ॥१॥ नयन मलिनपरनारि निरखि,मनमलिन विषय सँग लागे। हृदय मलिन, बासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥२॥