पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१६५

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विनय-पत्रिका १७० जोग-विराग, ध्यान-जप-तप करि, जेहि सोजत मुनि ग्यानी। वानर-भालु चपल पसुपामर, नाथ तहाँ रति मानी ॥६॥ लोकपाल, जम, काल, पवन, रवि, ससि सब आग्याकारी। तुलसिदास प्रभु उग्रसेनके द्वार चैत फर धारी ॥ ७॥ भावार्थ-श्रीहरि अपने दासपर इतना प्रेम करते है कि अपनी सारी प्रभुता भूलकर उस भक्तके ही अधीन हो जाते हैं । उनकी यह रीति सनातन है ॥ १ ॥ जिस परमात्माने देवता, दैत्य, नाग और मनुष्योंको कर्मोंकी बडी मजबूत डोरीमें बॉध रक्खा है, उसी अखण्ड परब्रह्मको यशोदाजीने प्रेमवश जबरदस्ती ( ऊग्वलसे) ऐसा बॉध दिया कि जिसे आप खोल भी नहीं सके ॥ २॥ जिसकी मायाके वश होकर ब्रह्मा और शिवजीने नाचते-नाचते उसका पार नहीं पाया, उसीको गोप-रमणियोंने ताल बजा-बजाकर (ऑगनमे) नचाया ॥ ३ ॥ वेढका यह सिद्वान्त प्रसिद्ध है कि भगवान् सारे विश्वका भरण-पोपण करनेवाले, लक्ष्मीजीके खामी और तीनों लोकोंके अधीश्वर हैं, ऐसे प्रभुकी भी भक राजा बलिके आगे कुछ भी प्रभुता नहीं चल सकी, वर प्रेमवश ब्राह्मण बनकर उससे भीख माँगनी पडी ॥४॥जिसके नाम-स्मरणमात्रसे संसारके जन्म-मरणरूपी दु.खोंके भारसे जीव छूट जाते हैं, उसी कृपानिधिने भक्त अम्बरीषके लिये खयं दस बार अवतार धारण किया॥ ५ ॥ जिसको संयमी मुनिगण योग, वैराग्य, ध्यान, जप और तप करके खोजते रहते हैं, उसी नाथने बंदर, रीछ आदि नीच चञ्चल पशुओंसे प्रीति की ॥ ६ ॥ लोकपाल, यमराज, काल, वायु, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब जिसके आज्ञाकारी हैं, वही प्रभु प्रेमवश उग्रसेनके द्वारपर हाथोंमें लकडी लिये दरवानकी तरह खड़ा रहता है ॥७॥