पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१६७

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विनय-पत्रिका १७२ [१०० सुनि सीतापति-सील-सुभाउ । मोद न मन, तन पुलक, नयन जल सो नर हर खाउ ॥१॥ सिसुपनतें पितु, मातु, बंधु, गुरु, सेवक, सचिव, सपाउ । कहत राम-विधु-बदन रिसोहे सपनेहुँ लरयो न काउ ॥२॥ खेलत संग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ । जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवाचत ढाउ॥३॥ सिला साप-संताप-विगत भइ, परसत पावत पाउ । दई सुगति सोन हेरि हरप हिय, चरन छुएको पछिताउ ॥४॥ भव-धनु मंजि निदरि भूपति भृगुनाथ साइ गये ताउ । छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इती न अनत समाउ ॥५॥ कह्यो राज, वन दियो नारिवस, गरि गलानि गयो राउ । ता कुमातुको मन जोगवत ज्यौं निज तन मरम कुघाउ ॥ ६॥ कपि-सेवा-धस भये कनौड़े, कहो पवनसुत आउ । देवेको न कछु रिनियाँ हो धनिक तूं पत्र लिखाउ ॥७॥ अपनाये सुग्रीव विभीषन, तिन न तज्यो छल-छाउ । भरत सभा सनमानि सराहत, होत न हृदय अधाउ ॥ ८॥ निज करुना करतूति भगतपर चपत चलत चरचाउ । सकृत प्रनाम प्रनत जस बरनत, सुनत कहत फिरि गाउ ॥९॥ समुझि समुझि गुनग्राम रामके, उर अनुराग बढाउ। तुलसिदास अनयास रामपद पाइहै प्रेम-पसाउ ॥१०॥ भावार्थ-श्रीसीतानाथ रामजीका शील-खभाव सुनकर जिसके मनमें आनन्द नहीं होता, जिसका शरीर पुलकायमान नहीं होता, जिसके नेत्रोंमें प्रेमके ऑसू नहीं भर आते, वह दुष्ट धूल फॉकता फिरे