पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१६९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१७४ AS विनय-पत्रिका तू चाहे तो मुझसे दिपा-पढ़ी करमा ले॥७॥ सुगर और विसीपगने अपना कपट-भाष नहीं सदा, पान्नु आपने नो उन्हें अपना ही दिया। भरतजीका तो सदा भरी मभाग आप सम्मान करने का ,टनी प्रशंसा करते करते तो आपके एटया तृमि नहींनी ॥ ८॥ मक्तोंपर आपने जो-जो दया और उपकार फिरे। उनी तो चर्चा चलते ही आप लजामे मानी गई जाने (भानी प्रशसा आपको सुहाती ही नहीं); पर जो एक बार भी आपको प्रगाम करना है. और शरणमे आ जाता है, आप सदा उसक वर्गन करते ६, सुनते है और कह-कहकर दूसरोंमे गान कमाते है॥०॥ ऐसे कोमलहृदय श्रीरामजीके गुणसम्ोंको समझ-समझकर मेरे एदया प्रेमकी बाढ आ गयी है, हे तुलसीदास ! इस प्रेमानन्दके कारण तू अनायास ही श्रीरामके चरण-कमलोंको प्राप्त करेगा ॥ १० ॥ [१०१] जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे । काको नाम पतित-पावन जग, फेहि अति दीन पियारे ॥१॥ कौने देव बराइ विरद-हित, हठि इठि अधम उघारे। खग-मृग, व्याध, पपान, विटपजद, जवन फवन सुर तारे ॥ २॥ देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब माया-वियस विचारे। तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपी हारे ॥३॥ भावार्थ--हे नाथ ! आपके चरणोंको छोडकर और कहाँ जाऊँ! ससारमें पतिप-पावन' नाम और किसका है ? ( आपकी भोति) दीन-दुखियारे किसे बहुत प्यारे है ? ॥१॥ आजतक किस देवताने अपने बानेको रखनेके लिये हठपूर्वक चुन-चुनकर नीचोंका