पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१७४

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१७९ विनय-पत्रिका मेरा मन सदा-सर्वदा लगता है कि नहीं ॥ २॥ जबतक मैं इन्द्रियोंके वशमें था, तबतक उन्होंने ( मुझे मनमाना नाच नचाकर ) मेरी बड़ी हँसी उड़ायी, परन्तु अब खतन्त्र होनेपर यानी मन-इन्द्रियोंको जीत लेनेपर उनसे अपनी हँसी नहीं कराऊँगा | अब तो अपने मनरूपी भ्रमरको प्रण करके श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लगा दूँगा । अर्थात् श्री- रामजीके चरणोंको छोड़कर दूसरी जगह मनको जाने ही नहीं दूंगा ॥३॥ राग रामकली [१०६] महाराज रामादरयो धन्य सोई। गरुम, गुनरासि, सरवग्य सुकृती, सूर, सील-निधि, साधु तेहि सम न कोई ॥१॥ उपल, केवट, कील, भालु, निसिचर, सवरि, गीध सम-दम- दया-दान-हीने। नाम लिये राम किये परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुन- गान कीने ॥२॥ व्याध अपराधकी साध राखी कहा, पिंगलै कौन मतिभगति भेई । कौन धौंसोमजाजीअजामिल अधम, कौन गजराजधों वाजपेयी।। पांडु-सुत, गोपिका, विदुर, कुवरी, सवरि, सुद्ध किये सुद्धता लेस कैसो। प्रेमलखि कृत किये आपने तिनहुको,सुजससंसारहरिहरकोजैसो कोल,खस,भील,जवनादिखलराम कहि नीच ऊँचपदकोन पायो दीन-दुख-दवनश्रीरवन करुना-भवन,पतित-पावन बिरद वेद गायो मंदमति, कुटिल, खल-तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँ लोक तिहुँ काल कोऊ।