पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१७७

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१८२ विनय-पत्रिका ही प्रसन्न हो जाते हैं और सब तरहसे पवित्र कर देते हैं ।। ३ ।। सब सुख दे देते हैं और दुःखोंको भस्म कर डालते हैं। वे दुखी जनोंके बन्धु हैं, गुणोंको ग्रहण करते और अवगुणोंको हर लेते हैं, ऐसे करुणा-सागर हैं ॥ ४ ॥ सब देश और सब समय सदा पूर्ण रहते हैं, ऐसा वेद-पुराण कहते हैं । वे सबके स्वामी हैं, सबमें रमते हैं और सबके मनकी बात जानते हैं ॥५॥ (ऐसे स्वामीको छोड़कर ) करोड़ों प्रकारकी कामना करके दूसरे अनेक देवताओंको कौन पूजे ? हे तुलसीदास ! ( अपने तो) उसीकी सेवा करनी चाहिये जिसकी सेवा देवदेव महादेवजी करते हैं ॥ ६॥ [ १०८ ] बीर महा अवराधिये, साधे सिधि होय । सकल काम पूरन करे, जानै सब कोय ॥१॥ बेगि, बिलंब न कीजिये लीजै उपदेश । बीजमंत्र जपिये सोई, जो जपत महेस ॥२॥ महा प्रेम-धारि-तरपनभलो, घृत सहज सनेहु । संसय-समिध,अगिनि-छमा,ममता-बलि देहु॥३॥ अघ-उचाटि, मन बस कर, मारै मद मार। __आकरषै सुख-संपदा-संतोष-विचार ॥ ४॥ जिन्ह यहिभाँतिभजन कियो, मिले रघुपति ताहि । तुलसिदास प्रभुपथ चढ्यौ,जौलेहु निवाहि ॥५॥ भावार्थ-महान् वीर श्रीरघुनाथजीकी आराधना करनी चाहिये, जिन्हें साधनेसे सब कुछ सिद्ध हो जाता है। वे सब इच्छाएँ पूर्ण कर