पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१९७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका २०२ भावार्थ-हे रघुनाथजी! मुझे कुछ ऐसा समझ पड़ता है कि हे दयाल ! हे सेवक-हितकारी | तुम्हारी कृपाके बिना न तो मोह ही दूर हो सकता है और न माया ही छूटती है ॥१॥ जैसे रातके समय घरमें केवल दीपककी बातें करनेसे अँधेरा दूर नहीं होता, वैसे ही कोई वाचिक ज्ञानमें कितना ही निपुण क्यों न हो, संसार- सागरको पार नहीं कर सकता ॥ २॥ जैसे कोई एक दीन, दुखिया भोजनके अभावमें भूखके मारे दु.ख पा रहा हो और कोई उसके घरमें कल्पवृक्ष तथा कामधेनुके चित्र लिख-लिखकर उसकी विपत्ति दूर करना चाहे तो कभी दूर नहीं हो सकती। वैसे ही केवल शास्त्रोंकी बातोंसे ही मोह नहीं मिटता ॥ ३ ॥ कोई मनुष्य रात- दिन अनेक प्रकारके षट्-रस भोजनोंपर व्याख्यान देता रहे; तथापि भोजन करनेपर भूखकी निवृत्ति होनेसे जो संतुष्टि होती है उसके सुखको तो वही नानता है, जिसने बिना ही कुछ बोले वास्तवमें भोजन कर लिया है । ( इसी प्रकार कोरी व्याख्यानबाजीसे कुछ नहीं होता, करनेपर कार्यसिद्धि होती है)॥ ४॥ जबतक अपने हृदयमें तत्व-ज्ञानका प्रकाश नहीं हुआ और मनमें विषयोंकी आशा बनी हुई है, तबतक हे तुलसीदास ! इस जगत्की योनियोंमें भटकना ही पडेगा, सुख सपनेमें भी नहीं मिलेगा ॥ ५॥ [१२४] जो निज मन परिहरै विकाय। तौकत द्वैत-जनित संसृति-दुख, संसय, सोक अपारा ॥ १ ॥ सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये मन कीन्हें वरिआई। त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि, हाटक, तृनकी नाई ॥ २ ॥