पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका तांडवित-नृत्यपर, डमरु डिडिमप्रवर, अशुभ इव भाति कल्याणराशी। महाकल्यांत ब्रह्मांड-मंडल-दवन,भवन कैलास,आसीन काशी॥५॥ तज्ञ, सर्वज्ञ, यश, अच्युत, विभो, विश्व भवदंशसंभव पुरारी। ब्रांद्र, चंद्रार्क, वरुणानि, वसु, मरुत, यम, अर्चि भवदंघ्रि सर्वाधिकारी। अकल, निरुपाधि,निर्गुण,निरंजन,ब्रह्मकर्म-पथमेकमज निर्विकारं। अखिलविग्रह, उग्ररूप, शिव, भूपसुर, सर्वगत, शर्व सर्वोपकारं ॥ झान-चैराग्य, धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुभग सौभाग्य शिव! सानुकूल। तदपिनर मूढ आरूढ संसार-पथ, भ्रमतभव,विमुखतव पादमूलं॥ नष्टमति, दुष्ट अति, कष्ट-रत, खेद-गत, दास तुलसी शंभु- शरण आया। देहि कामारि श्रीराम-पद-पंकजे भक्ति अनवरत गत-भेद-माया । मावार्थ हे शिव ! मोहान्धकारका नाश करनेके लिये आप साक्षात् सूर्य हैं । हे हर ! हे रुद्र । हे शरण्य ! हे लोकाभिराम ! आप मेरा शोक हरण करनेवाले हैं। आपके मस्तकपर द्वितीयाका बालचन्द्र शोभा पा रहा है, आपके बडे-बड़े नेत्र कमलके समान हैं। आप सौ करोड़ कामदेवके समान सुन्दरताके भण्डार हैं ॥१॥ आप- की सुन्दर मूर्ति शाल, कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान शुभ्रवर्ण है; करोगों मप्पाइक सूर्योके समान आपके शरीरका तेज झलमला गत समस्त शरीरमें भस्म लगी हुई है। आधे असमें हिमाचल- कन्या पानीजी शोभित हो रही हैं, साँरों और नर-कपालोंकी माला अगले रिराज रही है ॥२॥ मस्तकार बिजली के समान चमकते