पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२१९

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विनय-पत्रिका २२४ है, जिससे उसकी बीमारी बढ़ जाती है।) शिशु, कुमार और किशोरावस्थामें तू जो अपार पाप करता है, उसका वर्णन कौन करे ? अरे निर्दय ! महादुष्ट ! तुझे छोडकर और कौन ऐसा है __ जो इन्हे सह सकेगा? [७] जवानीमें तू युवती स्त्रीकी आसक्तिमें फंसा, तब तो महान् अज्ञान और मदमें मतवाला हो गया। उस जवानीके नशेमें तूने धर्मकी मर्यादा छोड दी और पहले ( गर्भमें और लडकपनमें ) जो कष्ट हुए थे, उन सबको भुला दिया ( और पाप करने लगा) । पिछले कष्टसमूहोंको भूल गया । ( अब पाप करनेसे ) आगे तुझे जो संकट प्राप्त होंगे, अरे उनपर विचार करके तेरी छाती नहीं फट जाती ? जिससे फिर गर्भके गड्ढेमें गिरना पड़े, संसार-चक्रमें आना पडे, तूने वारंवार वैसे ही कर्म किये । जिस शरीरका परिणाम ( मरनेपर ) कीड़ा, राख या विष्ठा होगा, ( कत्रमें गाड़नेसे सड़कर कीड़ोंके रूपमें बदल जायगा, जलानेपर राख हो जायगा या जीव-जन्तु खा डालेंगे तो उनकी विष्ठा बन जायगा ) उसीके लिये तू सारे संसारका शत्रु वन बैठा । परायी स्त्री और पराये धन (पर प्रीति ) और दूसरों से द्रोह, यही संसारमें नित्य नया बढ़ता गया । [८] देखते-ही-देखते वुढापा आ पहुंचा, जिसे तूने स्वप्नमें भी नहीं बुलाया था; उस वुढ़ापेका हाल कहा नहीं जाता । उसे अब अपने शरीरमे प्रत्यक्ष देख ले, शरीर जर्जर हो गया है, बुढापेके कारण रोग