पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२२१

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विनय-पत्रिका २२६ भक्ति सत्सङ्गाके बिना प्राप्त नहीं होती, और सत तभी मिलते हैं जब रघुनाथजी कृपा करते हैं । जब दीनदयालु रघुनापजी कृपा करते हैं तब संतसमागम होता है। जिन संतोंके दर्शन, स्पर्श और सत्सङ्ग- से पाप समूह समूल नष्ट हो जाते हैं, जिनके मिलनेसे सुख-दुःखमें समबुद्धि हो जाती है, अमानिता आदि अनेक सद्गुण प्रकट हो जाते हैं तथा भलीभॉति परमात्माका बोध हो जानेके कारण मट, मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहज ही दूर हो जाते हैं। [११] ऐसे साधुओंका सेवन करनेसे द्वैतका भय भाग जाता है, (सर्वत्र परमात्म-बुद्धि होजानेसे वह निर्भय हो जाता है ) श्रीरघुनाथ- जीके चरणों में ध्यान लग जाता है। शरीरसे उत्पन्न हुए सब विकार छूट जाते हैं और तब अपने स्वरूप में आत्मस्वरूपमें प्रेम होता है । जिसका अपने स्वरूपमें अनुराग हो जाता है अर्थात् जो आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है उसकी दशा संसारमें कुछ विलक्षण ही हो जाती है। सन्तोप, समता, शान्ति और मन-इन्द्रियों- का निग्रह उसके स्वाभाविक हो जाते हैं, फिर वह अपनेको देहधारी नहीं मानता अर्थात् उसका देहात्म-बोध चला जाता है । वह विशुद्ध संसार-रोग-रहित और एकरस (परमात्मस्वरूपमें नित्य स्थित) हो जाता है । फिर उसे हर्ष-शोक नहीं व्यापता । जिसकी ऐसी नित्य स्थिति हो गयी वह तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला होता है। [१२] जो मनुष्य इस मार्गपर मन लगाकर चलता है, भगवान् उसकी सहायता क्यों न करेंगे। यह जो मार्ग वेद और सतोंने दिखा दिया