पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२३५

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विनय-पत्रिका २४० फल, वेदोंका सार और ससाररूपी नदीसे पार जानेके लिये बेड़ा है, ऐसे राम-नामको यह दुष्ट दूसरेके हाथमें कौड़ी-कौडीके लिये वेचता हुआ जबरदस्ती उनका गुलाम बनता फिरता है ॥ ५॥ यदि कभी सत्सगके प्रभावसे भगवत्के मार्गके समीप जाता भी हूँ तो विषयोंकी आसक्ति उमड़कर मनको तुरन्त सासारिक बुरी कामनारूपी गड़हेमें धक्का दे देती है ॥ ६॥ एक तो मैं वैसे ही दीन, पापी और बुद्धिहीन हूँ तथा विपत्तियोंके जालमें खूब फंसा पडा हूँ, तिसपर हे करुणानिधि ! मनके इस असह्य धक्केको मैं कैसेसह सकता हूँ|७|| मैं अनेक यत्न करके हार गया, इससे मैं पहलेसे ही कहे देता हूँ कि तुलसीदासका यह भय (जन्म- मरणका त्रास)तभी दूर होगा जब आप उसके हृदयमें निवास करेंगे॥८॥ [१४४] सो धौ को जो नाम-लाज ते नहिं राख्यो रघुवीर। कारुनीक विनु कारन ही हरि हरी सकल भव-भीर ॥ १ ॥ वेद-विदित, जग-विदित अजामिल विप्रवंधु अघ-धाम । घोर जमालय जात निवारयो सुत-हित सुमिरत नाम ॥ २ ॥ पसु-पामर अभिमान-सिंधु गज अस्यो आइ जब ग्राह । सुमिरत सकृत सपदि आये प्रभु, हरन्यो दुसह उर दाह ॥ ३ ॥ व्याध, निषाद, गीध गनिकादिक, अगनित औगुन मूल । नाम-ओटतें राम सवनिकी दूरि करी सब सूल ॥ ४ ॥ 8 आचरन घाटि हो तिनते, रघुकुल भूषन भूप। " तुललिदास निसिवासर परयो भीम तम-कूप ॥ ५ ॥ ___भावार्थ-हे रघुवीर ! ऐसा कौन है, जिसे आपने अपने नामकी लाजसे अपनी शरणमें नहीं रक्खा । हे हरि! आप तो बिना ही कारण