पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२३६

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२४१ विनय-पत्रिका करुणा करनेवाले और (जन्म-मरणरूपी) संसारके भयको दूर करनेवाले हैं ॥१॥ वेदमें प्रकट है और संसारमे भी प्रसिद्ध है कि अजामिल जातिका ब्राह्मण महान् पापोंका स्थान था। यमलोक जाते समय जब उसने पुत्रके बहाने आपका 'नारायण' नाम लिया तव आपने उसे यमलोक जानेसे रोक दिया ॥ २॥ जब मगरने महान् अभिमानी पामर पशु हाथीको पकड़ लिया तब उसके एक ही बार स्मरण करनेपर हे प्रभो! आप वहाँ दौडे आये और उसकी दुःसह हार्दिक पीडाको मिटा दिया (मगरसे छुडाकर उसे परमधाम प्रदान कर दिया ) ॥ ३॥ व्याध (वाल्मीकि ), निषाद (गुह ), गीध (जटायु), गणिका ( पिंगला ) इत्यादि अगणित जीव जो पापोंकी जड़ थे, परन्तु हे रामजी ! आपने अपने नामकी ओटसे इन सबकी सारी पीड़ाओंका नाश कर दिया ॥ ४ ॥ हे रघुवंशभूषण महाराज ! मैं इन सबोंसे किस आचरणमें कम हूँ ? फिर भी मैं तुलसीदास रात- दिन भयानक अज्ञानरूपी कुऍमें पड़ा दुःख भोग रहा हूँ (सबको निकाला है तो अब मुझे भी निकालिये) ॥५॥ [१४५] कृपासिंधु ! जन दीन दुवारे दादि न पावत काहे। जव जहँ तुमहिं पुकारत आरत, तहँ तिन्हके दुख दाहे ॥१॥ गज, प्रहलाद,पांडुसुत, कपि सवको रिपु-संकट मेट्यो । प्रनत,बंधु-भय-विकल, विभीपन उठिसोभरतज्योंभेट्यो ॥२॥ मैं तुम्हरो लेइ नाम ग्राम इक उर आपने वसावों। भजन, विवेक,विराग, लोगभले, क्रम-क्रमकरिल्यावो॥ ३॥ सुनि रिस भरे कुटिल कामादिक, करहिं जोर वरिआई। वि० ५० १६-