पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५३

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२५८ विनय-पत्रिका को जान को जैहै जमपुर को सुरपुर पर-धामको। तुलसिहि बहुत भलो लागत जग जीवन रामगुलामको ॥ ५॥ भावार्थ-मुझे तो एक राम-नामका ही विश्वास है। मेरे कुटिल मनका कुछ ऐसा ही स्वभाव है कि वह और कहीं विश्वास ही नहीं करता ॥ १॥ छः (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त) शास्त्रोंका तथा ऋक, यजु, अथर्वण और साम वेदोंका पढ़ना तो मेरी छठीमें ही नहीं पडा ( भाग्यमें ही नहीं लिखा गया) है और व्रत, तीर्थ, तप आदिका तो नाम सुनकर मन डर रहा है। कौन ( इन साधनोंमें ) पच-पचकर मरे या शरीरको क्षीण करे ॥ २ ॥ कर्मकाण्ड ( यज्ञादि ) कलियुगमें कठिन है, और उसका होना भी धनके अधीन है। ( अब रहे ) ज्ञान, वैराग्य, योग, जप और तप आदि साधन, सो इनके करनेमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिका भय लगा है ॥ ३ ॥ इस भव ( संसार ) में श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहको गानेवाले ही सदा सब प्रकारसे योग्य हैं । जो राम-नामरूपी कल्पवृक्षकी छायामें बैठे हैं, उन्हें घनघोर घटा ( तमोमय अज्ञान ) अथवा तेज धूप ( विषयोंकी चकाचौंध ) का क्या डर है ? भाव यह है कि वे अज्ञानके वश होकर विपयोंमें नहीं फंस सकते । इससे पाप-ताप उनसे सदा दूर रहते हैं ॥ ४ ॥ कौन जानता है कि कौन नरक जायगा, कौन खर्ग जायगा और कौन परमधाम जायगा ? तुलसीदासको तो इस संसारमें रामजीका गुलाम होकर जीना ही बहुत अच्छा लगता है ॥ ५॥ [१५६] कलि नाम कामतरु रामको। दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोप घोर धन घामको ॥१॥