पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका २६० टहल सहल जन महल-महल, जागत चारो जुग जाम लो। देखत दोष न खीझतः रीझत सुनि सेवक गुन-ग्राम सो॥४॥ जाके भजे तिलोक-तिलक भये, त्रिजग जोनि तनु तामसो। तुलसी ऐसे प्रभुहि भजै जो न ताहि विधाता वाम सो ॥ ५॥ भावार्थ-श्रीराम-सरीखे सुन्दर स्वामीकी सेवा करनी चाहिये । जो सुख देनेवाले, सुशील, चतुर, वीर, पवित्र और करोड़ों कामदेवोंक समान सुन्दर हैं ॥ १॥ सरस्वती, शेषनाग और संतजन जिनकी महिमाका बखान करते हैं । सामवेद-सरीखे जिनके गुणोंका गान करते हैं । शिवजी-सरीखे भी जिनके नामका प्रेमपूर्वक स्मरण करते हुए प्रेम करना चाहते हैं ॥२॥ जिन्हें (पिताकी आज्ञासे) विदेश अर्थात् वन जातं समय तनिक भी क्लेश नहीं हुआ। जिन्हें एक बार भी कोई प्रणाम कर लेता है तो संकोचके मारे दब जाते हैं। इस बातका साक्षी विभीषण प्रसिद्ध है, कि जो आज भी ( लंकामें) अटल राज्य कर रहा है ॥ ३ ॥ जिनकी चाकरी करना बड़ा सहल है ( क्योंकि वे सेवककी भूल-चूककी ओर देखते ही नहीं); जो अपने भक्तोंके घट-घटमें, चारों युगोंमें, चारों पहर जागते रहते हैं। (हृदयमें बैठकर सदा रखवाली करते हैं ) अपराध देखते हुए भी सेवकपर क्रोध नहीं करते। परन्तु जब अपने सेवककी गुणावली सुनते हैं, तब उसपर रीझ जाते हैं ॥ ४॥ जिन्हें भजनेसे तिर्यक योनिके (पशु-पक्षी) एवं तामसी गरीरवाले (राक्षस ) भी तीनों लोकोंके तिलक बन गये। हे तुलसी । ऐसे (सुखद, सुशील, सुन्दर, भक्तवत्सल, चतुर, पतितपावन ) प्रभुको जो नहीं भजते उनपर विधाता प्रतिकूल ही है ॥ ५॥