पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५७

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विनय-पत्रिका २६२ उन्हें दुनियाको निहोरा कर-कर सुनाता फिरता हूँ। भाव यह कि मुझे कोई भी पापी न समझकर सब लोग बडा धर्मात्मा समझें ॥ ३॥ कभी जो कुछ सत्कर्म बन जाता है उसे खेतमें पड़े हुए अन्नके दानोंकी तरह बटोर-बटोरकर रख लेता हूँ, किन्तु हे दयानिधान ! दम्भ जबरदस्ती हृदयमें घुसकर उसे बाहर निकाल फेंकता है। भाव यह है कि दम्भ बढ़कर थोडे-बहुत सुकृतको भी नष्ट कर देता है॥ ४ ॥ इसके सिवा लोभ मेरे मनको आशारूपी रस्सीसे इस तरह नचा रहा है, जैसे बाजीगर बंदरके गलेमें डोरी बाँधकर उसे मनमाना नचाता है। ( इतनेपर भी मैं दम्भसे ) एक बड़े पण्डित- की नाई परम वैराग्यके तत्त्वकी बातें बना-बनाकर सुनाता फिरता हूँ॥५॥ इतना ( दम्भी) होनेपर भी मैं तुम्हारा (दास) कहाता हूँ। लाजको तो मानो मैं घोलकर ही पी गया हूँ। हे रघुनाथजी । तुम उदार हो, इस निर्लज्जतापर ही रीझकर तुलसीका बन्धन काट दो। ( मुझे भव-बन्धनसे मुक्त कर दो ) ॥६॥ [१५९] है प्रभु! मेरोई सब दोसु । सीलसिंधु कृपालु नाथ अनाथ आरत-पोमु ॥१॥ बेष बचन विराग मन अघ अवगुननिको कोसु । राम प्रीति प्रतीति पोली, कपट-करतव ठोसु ॥२॥ राग-रंग कुसंग ही सो, साधु-संगति रोसु । चहत केहरि-जसहि सेइ सृगाल ज्यों खरगोसु॥३॥ संभ-सिखवन रसन हूँ नित राम-नाहिं घोस। दभहू कलि नाम कुंभज सोच-सागर सोसु॥४॥