पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२६

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२७ विनय-पत्रिका कहते हैं, वे भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले सर्वेश्वर शिवजी आनन्दवन काशीमें विराजमान हैं ॥९॥ [१२] शंकर, शंप्रद, सजनानंददं, शैल-कन्या-वरं, परमरम्य । काम-मदमोचनं,तामरस-लोचनं वामदेवं भजे भावगम्यं ॥१॥ कंबु-कुंदेदु-कपूर-गोरं शिवं, सुंदर, सच्चिदानंदकंद। सिद्ध-सनकादि-योगींद्र-वृंदारका, विष्णु-विधि चन्वचरणारविदा ब्रह्म-कुल-वल्लभसुलभमतिदुर्लभं विकटवेष, विभुं वेदपारं। नौमि करुणाकरंगरल-गंगाधरं, निर्मलंनिर्गुणं, निर्विकारं ॥३॥ लोकनार्थ शोक-शूल-निर्मूलिन,शूलिनं मोह-तम-भूरि-भार्नु। कालकालं,कलातीतमजरं,हर कठिन-कलिकाल कानन-शानुं । तशमशान-पाथोधि-घटसंभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं । प्रचुर-भव-भंजन,प्रणत-जन-रंजन दास तुलसीशरण सानुकूलं ॥ भावार्थ-कल्याणकारी, कल्याणके दाता, संतजनोंको आनन्द देनेवाले, हिमाचलकन्या पार्वतीके पति, परम रमणीय, कामदेवके घमण्डको चूर्ण करनेवाले कमलनेत्र, भक्तिसे प्राप्त होनेवाले महादेवका मै भजन करता हूँ॥१॥ जिनका शरीर शङ्ख, कुन्द, चन्द्र और कपूरके समान चिकना, कोमल, शीतल, श्वेत और सुगन्धित है; जो कल्याणरूप, सुन्दर और सच्चिदानन्दकन्द हैं। सिद्ध, सनक, सनन्दन, सनातन,सनत्कुमार, योगिराज, देवता, विष्णु और ब्रह्मा जिनके चरणारविन्दकी वन्दना किया करते हैं।॥ २॥ जिनको ब्राह्मणोंका कुल प्रिय है; जो संतोंको सुलभ और दुर्जनोंको दुर्लभ हैं, जिनका वेष