पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२६३

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विनय-पत्रिका याचनारहित (पूर्णकाम ) नहीं का दिया । है दयानिधे ! अब तुलसीको यह दारुण आशारूपी पिशाचिनी दुःख दे रही है (इससे मेरा पिण्ड छुडा दो और मुझे भी अपने दर्शन देकर कृतार्थ करो)॥४॥ [१६४] जानत प्रीति-रीति रघुराई। नाते सब हाते करि रायत, राम सनेह-सगाई ॥१॥ नेह निवाहि देह तजि दसरथ, कीरति अचल चलाई। ऐसेहु पितु ते अधिक गीधपर ममता गुन गरमाई ॥२॥ तिय-विरही सुग्रीव सखा लस्त्रि प्रानप्रिया बिसराई : रन परयो बंधु विभीपन ही को, सोच हृदय अधिकाई ॥३॥ घर गुरुगृह प्रिय सदन सासुरे, भह जब जहें पहुनाई। तव तहँ कहि सवरीके फलनिकी रुचि माधुरी न पाई ॥४॥ सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई। केवट भीत कहे सुख मानत वानर वंधु वड़ाई ॥ ५॥ प्रेम-कनौड़ो रामसो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न भाई। तेरो रिनी हो कहयो कपि सों ऐसी मानिहि को सेवकाई ॥६॥ तुलसी राम-सनेह-सील लखि, जो न भगति उर आई। तौ तोहिं जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गवॉई ॥ ७॥ भावार्थ प्रीतिकी रीति एक श्रीरघुनाथजी ही जानते हैं। श्रीरामजी सब नातोको छोड़कर केवल प्रेमका ही नाता रखते हैं। दशरथने प्रेमके निभानेमें शरीर छोडकर, अपनी अचल कीर्ति स्थापित कर दी, उन प्रेमी पितासे भी आपने जटाय गोधरा माता और गुण-गौरवता दिखायी, (दशरथका मरण रामके सामने नहीं हुआ, परन्तु प्यारे गीधके प्राण तो रामकी गोदर