पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२६७

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विनय-पत्रिका २७२ असुभ होइ जिन्हके सुमिरे ते वानर रीछ विकारी। चेद-विदित पावन किये ते सव, महिमा नाय ! तुम्हारी ॥९॥ कह लगि कहाँ दीन अगनित जिन्हकी तुम विपति निवारी। कलिमल-असित दास तुलसीपर, काहे कृपा बिसारी ॥१०॥ भावार्थ-दीनोंका ऐसा हित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे अति कोमल, करुणाके भण्डार और बिना ही कारण दूसरोंका उपकार करनेवाले हैं ।। १ ।। साधनोंसे रहित, दीन, गौतम ऋषिकी स्त्री अहल्या अपने पापोंके कारण शिला हो गयी थी। उसे आपने घरसे चलकर, अपने पवित्र चरणसे छूकर, घोर शापसे छुडा दिया ॥ २॥ हिंसामें रत गुह निषाद, जिसका तामसी शरीर था और जो पशुकी तरह वनमें फिरता रहता था, उसे आपने वंश और जातिका विचार किये बिना ही, प्रेमके वश होकर हृदयसे लगा लिया ॥ ३ ॥ यद्यपि इन्द्रके पुत्र जयन्तने ( काकरूपसे श्रीसीता- जीके चरणमें चोंच मारकर ) इतना भारी अपराध किया था कि कुछ कहा नहीं जा सकता तयापि जब वह ( वाणके मारे घबराकर रक्षाके लिये ) सब लोकोंको देख फिरा और फिर शोकसे व्याकुल होकर शरणमें आया, तब उसका सारा भय दूर कर दिया ।॥ ४॥ जटायु गीध पक्षीकी योनिका था, सदा मास खाया करता था। उसने ऐसा कौन-सा व्रत धारण किया था, कि जिसकी आपने अपने हाथसे, पिताके समान अन्त्येष्टिक्रिया कर सब बातें सुधार दी, अर्थात् मुक्ति प्रदान कर दी ॥ ५ ॥ शबरी नीच जातिकी मूर्खा स्त्री श्री. जो लोक और वेद दोनोंसे ही बाहर थी। परन्तु उसका सच्चा प्रेम समझकर कृपालु रघुनाथजीने उसे भी कृपापूर्वक दर्शन देकर