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पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२७१

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विनय-पत्रिका
२७६९
 


वंचक विषय विविध तनु घरि अनुभवे सुने अरु डीठे।
यह जानत हौं हृदय आपने सपने न अघाइ उबीठे॥२॥
तुलसिदास प्रभु सों, एकहि बल वचन कहत अति ढीठे।
नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठे॥३॥

भावार्थ—यदि मुझे श्रीरामचन्द्रजी ही मीठे लगे होते, तो (साहित्यके) नौ रस[] एवं (भोजनके) छः रस[] नीरस और फीके पड़ जाते (पर रामजी मीठे नहीं लगते, इसीलिये विषय-भोग मीठे मालूम होते हैं)॥ १॥ मैं भाँति-भाँतिके शरीर धारण कर यह अनुभव कर चुका हूँ तथा मैंने सुना और देखा भी है कि (संसारके) विषय ठग हैं। (मायामें भुलाकर परमार्थरूपी धन हर लेते हैं) यद्यपि यह मैं अपने जीमें अच्छी तरह जानता हूँ, तथापि कभी स्वप्नमें भी, इनसे तृप्त होकर मेरा मन नहीं उकताया (कैसी नीचता है। १)॥२॥ पर तुलसीदास अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीसे एक ही बर्छपर ये ढिठाईभरे वचन कह रहा है। (और वह बल यह है कि) हे नाथ! आपने अपने नामकी लाजसे किस-किसको दया करके (भवबन्धनसे छूटने के लिये) परवाने नहीं लिख दिये हैं। '(जिसने आपका नाम 'लिया, उसीको मुक्तिका परवाना मिलं गया, 'इसीलिये मैं भी यों कह रहा हूँ)॥३॥


  1. शृङ्गार, हास्य, करुणा, वीर, रुद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त-साहित्यके ये नौ रस हैं।
  2. कडुवा, तीखा, मीठा, कसैला, खट्टा और नमकीन—ये छः भोजन के रस हैं। भोजनके रस