पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२७१

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% 3A विनय-पत्रिका २७६ वंचक विषय विविध तनु धरि अनुभवे सुने अरु डीठे। यह जानत हो हृदय आपने सपने न अघाइ उपीठे ॥२॥ तुलसिदास प्रभु सों, एकहि बल वचन कहत अति ढीठे। नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठे ॥३॥ भावार्थ-यदि मुझे श्रीरामचन्द्रजी ही मीठे लगे होते, तो (साहित्यके ) नौ रस* एवं ( भोजनके ) छः रसा नीरस और फीके पड़ जाते (पर रामजी मीठे नहीं लगते, इसीलिये विषय-भोग मीठे मालूम होते हैं ) ॥१॥ मैं भाँति-भाँतिके शरीर धारण कर यह अनुभव कर चुका हूँ तथा मैंने सुना और देखा भी है कि (संसारके ) विषय ठग हैं । (मायामें भुलाकर परमार्थरूपी धन हर लेते हैं ) यधपि यह मैं अपने जीमें अच्छी तरह जानता हूँ, तथापि कभी स्वप्नमें भी, इनसे तृप्त होकर मेरा मन नहीं उकताया (कैसी नीचता है।)॥२॥पर तुलसीदास अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीसे एक ही बलपर ये ढिठाईभरे वचन कह रहा है । (और वह बल यह है कि) हे नाथ | आपने अपने नामकी लाजसे किस-किसको दया करके ( भवबन्धनसे छूटनेके लिये ) परवाने नहीं लिख दिये हैं । जिसने आपका नाम 'लिया, उसीको मुक्तिका परवाना मिल गया, 'इसीलिये मैं भी यों कह रहा हूँ )॥३॥ . शृङ्गार, हास्य, करुणा, वीर, रुद्र, भयानक बीमत्स, अद्भत और शान्त-साहित्यके ये नौ रस हैं। + कड़वा, तीखा, मीठा, कसैला, खश और नमकीन ये भोजनके रस हैं।