पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२८२

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२८७ विनय-पत्रिका जल बिनु थल कहा मीचु बिनु मीनको ॥ ३ ॥ बड़े ही की ओट बलि बाँचि आये छोटे हैं। चलत खरेके संग जहाँ-तहाँ खोटे हैं॥४॥ यहि दरवार भलो दाहिनेहु-बामको। मोको सुभदायक भरोसो राम-नामको ॥ ५ ॥ कहत नसानी है है हिये नाथ नीकी है। जानत कृपा निधान तुलसीके जीकी है ॥ ६ ॥ भावार्थ-हे रामजी! आप चाहे मुझसे उदासीन हो जायें पर मुझे तो आपकी ही आशा है। ( मेरे ऐसा कहनेसे आप नाराज न होइयेगा) आर्त अथवा स्वार्थी तो पागलोंकी-सी ही बातें किया करते हैं । भाव यह कि आप जो नित्य अपने जनोपर कृपा- दृष्टि रखते हैं उनके लिये तो मै कहता हूँ कि आप चाहे उदासीन हो जाये और मेरे लिये, यह अभिमानकी बात कहता हूँ कि मुझे तो आपकी ही आशा है, यह पागलोंकी-सी बाते ही तो हैं ॥१॥ जो मेघ पानीका दान करता है, सारे प्राणियोंकी रक्षा करता है, उसे किस वस्तुकी कमी है। पानी देकर जीवनकी रक्षा करनेवाले मेघको क्या चाहिये ? परन्तु प्रेमका अटल नियम निबाहनेके कारण पपीहेकी ही सराहना होती है ! भाव यह कि मेघ पपीहेको बिना ही किसी खार्थके स्वातिका जल देता है, इसमें उदारता मेधकी ही है, परन्तु दूसरी ओर न ताकनेके कारण सराहना चातककी हुआ करती है ॥ २ ॥ पवित्र और पुष्ट करनेवाले जलको मछलीसे लेश- मात्र भीलाभ नहीं है, पर मछलीके लिये जलको छोड़कर, ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ वह अपने प्राण बचा सके ? भाव यह कि वह जलको