पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२८३

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विनय-पत्रिका छोड़कर कहीं भी जीवित नहीं रह सकती। इसी प्रकार आपको मुझसे कोई लाभ नहीं, परन्तु मैं आपको छोड़कर कहाँ जाऊँ ! आपको अपनी शरणमें रखना भी होगा और तारीफ भी मेरी ही होगी ॥ ३ ॥ मैं आपकी बलैया लेता हूँ, देखिये बड़ोंके सहारे ही छोटे (सदा) बचते आये हैं, जहाँ-तहाँ खरे सिक्कोंके साथ खोट भी चला करते हैं । भाव यह कि आपके सच्चे भक्त असली सिक्के हैं और मैं पाखण्डी, नकली सिका होनेपर भी आपके नाम- की छापसे भवसागरसे तर जाऊँगा ॥ ४ ॥ आपके दरबारमें भले- बुरे सभीका कल्याण होता है, चाहे कोई आपके अनुकूल हो वा प्रतिकूल हो (जैसे विभीषण सम्मुख था तथा रावण विमुख था पर दोनों ही मुक हो गये)। हे श्रीरामजी ! मुझे तो केवल आपके कल्याणकारी नामका ही भरोसा है।॥ ५॥ हे नाथ ! कह देनेसे सब बात बिगड़ जायगी ( सारा भेद खुल जायगा), इससे मनकी मनहीमें रखना अच्छा है; फिर आप तो हे कृपानिधान ! तुलसीके मनकी सब जानते ही हैं ॥ ६॥ राग बिलावल [ १७९ ] कहाँ जाउँ, कासों कहाँ, कौन सुने दीनकी । त्रिभुवन तुही गति सव अंगहीनकी॥१॥ जग जगदीश घर घरनि घनेरे हैं। निराधारके अधार गुनगन तेरे हैं ॥२॥ गजराज-काज खगराज तजि धायो को। ' मोसे दोस-कोस पोसे, तोसे माय जायो को॥३॥