पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२८६

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२९१ विनय-पत्रिका अजामिल, गणिका आदि दीनोंके उद्धाररूपी कर्म देखकर मुझे दृढ़ विश्वास हो गया है) और मैंने उन लोगोंको भी देख, सुन और समझ लिया है जो दुनियामें बड़े कहे जाते हैं ।। ३ ॥ उनमेंसे किसने शिला बनी हुई अहल्याका शाप दूरकर उसे शान्ति प्रदान की और किसने लीलासे ही परशुराम-जैसे महाक्रोधी ऋपिको जीत लिया ? (किसीने नहीं)॥ ४ ॥ माता, पिता और भाईके लिये किसने लोक और वेदकी मर्यादाका पालन किया ? अपने वचनोंका अडिग कौन है ? और प्रणाम करते ही प्रणतको कौन निहाल कर देता है ? ( केवल एक श्रीरघुनाथजी ही) ।। ५॥ प्रेमके अधीन होकर किसने नीचों और दुष्टोंको इकट्ठा किया, अपनाया ? गीध और शबरीका (पिता-माताकी तरह ) कौन श्राद्ध करेगा ? ॥६॥ जिनके कहीं कोई सहारा नहीं है, उनका आधार कौन है ? दीनोंपर दया करनेवाला कौन है ? और बंदर, मल्लाह, राक्षस तथा रीछोंका मित्र कौन है (सिवा रघुनाथजी. के दूसरा कोई नहीं)॥७॥ हे महाराज ! आपने जितने कंगाल, मूर्ख और नीचोंको निहाल किया है, वे सब ही आज सतोंके समाजमे विराजितहो रहे हैं॥८॥ यह आपकी सच्ची-सच्ची बडाई कही गयी है, ("एक अक्षरं भी) बढ़ाकर नहीं कहा है ; किन्तु हे शीलके समुद्र ! तुलसीदासके ही लिये इतनी देर क्यों हो रही है ॥९॥ [१८१ - . केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये। मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥१॥ __सहस सिलाते अति जड़ मति भई है। कासो कहाँ कौन गति पाहनहिं दई है ॥२॥