पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२९०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


- - २९५ विनय-पत्रिका गीधको कियो सराध, भीलनीको खायो फल, सोऊ साधु-सभा भलीभाँति भनियत है। रावरे आदरे लोक बेद हूँ आदरियत, जोग ग्यान हूँ तें गरू गनियत है ॥२॥ प्रभुकी कृपा कृपालु ! कठिन कलि हूँ काल, । महिमा समुझि उर अनियत है। तुलसी, पराये वस भये रस अनरस, दीनबंधु । द्वारे हठ उनियत है॥३॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी ! प्रीतिकी रीति आप ही भलीभाँति जानते हैं । बलिहारी ! वेद आपकी विरदावलीको इस प्रकार मान रहे हैं कि आप बडेका बड़प्पन ( अभिमान ) एवं छोटेकी छोटाई ( दीनता) को दूर कर देते हैं ॥१॥ आपने जटायु गीधका श्राद्ध किया और शबरीके फल ( वेर ) खाये; यह बात भी संत- समाजमें अच्छी तरह बखानी जाती है कि जिस किसीका आपने आदर किया, लोक और वेद दोनों ही उसका आदर करते हैं। आपका प्रेम योग तथा ज्ञानसे भी बड़ा माना जाता है ॥२॥ हे कृपालु ! आपकी कृपासे इस कठिन कलिकालमें भी आपकी महिमाको समझकर भक्तजन हृदयमें धारण करते हैं । यद्यपि तुलसी दूसरोंके (विषयोंके ) अधीन होनेके कारण ( आपके प्रेमसे ) अनरस अर्थात् प्रेमहीन हो रहा है, तथापि हे दीनबन्धु ! वह आपके द्वारपर धरना दिये बैठा है (आपकी कृपा-दृटि पाये बिना हटनेका नहीं)॥३॥ [१८४] राम-नामके जपे जाइ जियकी जरनि।' कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भये, , जैसे तम नालिबेको चित्रके. तरनि ॥१॥