पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२९२

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२९७ विनय-पत्रिका दशा है) ॥२॥ न तो योग ही बनता है, न समाधि ही उपाधि- रहित है, वैराग्य और ज्ञान लंबी-चौडी बातें बनाने और वेष बनाने- भरके ही रह गये हैं। करनी कुछ भी नहीं, केवल कयनी है। कपटभरे करोडों कुमार्ग चल पड़े हैं। कहनी और रहनी सभी खोटी हो गयी हैं। सभी अपने-अपने आचरणोंकी सराहना करते हैं ॥ ३ ॥ (एक राम-नामकी महिमा रही है) शिवजी गङ्गाके किनारे काशीकी धर्म-भूमिपर मरते समय जीवको क्या उपदेश देते हैं ? वे श्रीरामनामके प्रतापका वर्णन करते हैं। दूसरोंसे कहते हैं और स्वयं भी जपते हैं। अनेक युगोंसे इसे ससार जानता है और वेद भी कहते चले आये हैं ॥ ४ ॥ अब तो राम-नामहीमें अपनी बुद्धिको लगाना चाहिये, राम-नामहीसे प्रेम करना चाहिये और राम नामहीकी शरण लेनी चाहिये । क्योंकि एक यही साधना जीवकी जन्म-मरणरूप विपत्तियोंको दूर करनेवाली है। है तुलसी! राम-नामपर विश्वास और दृढ़ प्रेम बनाये रक्खेगा, तो कमी-न-कभी श्रीरामजी अवश्य ही अपने दयालु खभावसे तुझपर दया करेगे ॥५॥ [१८५ ] लाज न लागत दास कहावत । सो आचरन विसारि सोच तजि, जो हरि तुम कहँ भावत ॥१॥ सकल संग तजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग वनावत। मो-सम-मंद महाखल पाँवर, कौन जतन तेहि पावत ॥२॥ हरि निरमल, मलग्रसित हृदय असमंजस मोहि जनावत । ज़ेहि सर काक कक बक सूकर क्यों मराल तहँ आवत ॥३॥