पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३०५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३१० विनय-पत्रिका (कोई नहीं)॥६॥ अभागेको कौन भाग्यवान बनाता है ? डरे हुओंको कौन अपनी शरणमें रखता है ? वेदोंमें फिसकी यश-गाथा गायी जा रही है और कवि एवं विद्वान् किसके गीत गा रहे हैं ? ( भगवान् रामचन्द्र ही एक ऐसे दीनबन्धु भक्तवत्सल हैं)॥७॥ जिसने उनके नाम (राम ) का आश्रय लिया, चाहे वह कैसा ही नीच और पापी क्यों न हो, उसे श्रीरामने इस तरह अपना लिया जैसे कोई ( मिले हुए) धनको ( तुरंत ) गाँठमें बाँध लेता है, और उसके खरे या खोटेपनको भी नहीं परखता ॥ ८॥ जो ऐसा मलिन मनवाला है कि जिसके कलियुगमें किये हुए कर्मोंको सुनकर सुननेवाले भी पापी हो जाते हैं, उस तुलसीदासको भी उन्होंने अपना दास मान लिया । श्रीरघुनाथजी ऐसे ही गरीबनिवाज हैं॥९॥ [१९२] जो पै जानकिनाथ सो नातो नेहु न नीच । खारथ-परमारथ कहा. कलि कुटिल विगोयो बीच ॥१॥ धरम वरन आश्रमनिके पैयत पोथिही पुगन । करतत्र बिनु वेष देखिये, ज्यों सरीर बिनु प्रान ॥२॥ वेदविहिन साधन सबै, सुनियत दायक फल चारि । विदिता प्रेस विनु जानिवो जैसे सर-सरिता यिनु वारि ॥३॥ नाना पथ निरवानके, नाना विधान बहु भाँति । तुलसी तू मेरे कहे जपु राम-नाम दिन-राति ॥४॥ भावार्थ-अरे नीच ! यदि श्रीजानकीनाथ रामचन्द्रजीसे तेरा प्रेम और नाता नहीं है, तो तेरे स्वार्थ और परमार्थ कैसे सिद्ध होंगे