पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३०९

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जो तनुप्रियाद किये अनमख,जगधि-हिलो विनय-पत्रिका छूट गया हो ॥ ८॥ पश्चात्ताप करना छोड़ दे। प्रभु रामचन्द्रजी उपकार माननेवाले और सभी बाहर-भीतरकी, आगे-पीछेकी बातोको जाननेवाले हैं ( उनसे तेरी कोई करनी छिपी नहीं है। तुलसीदास ! रामजीसे तरी कुछ नयी जान-पहचान नहीं है। (उनपर दृढ़ भरोसारख)९ [१९४] जो अनुराग न राम सनेही सों। तौलहोलाहु कहा नर-देही सो॥१॥ जोतनुधरिपरिहरिसव सुख,भये सुमतिराम-अनुरागी। सोतनु पाहअधाइकिये अघ अवगुन उदधि अभागी॥२॥ ग्यान-विराग, जोग-जप, तप-मख, जग मुद-मगनहि थोरे। राम-प्रेमविनु नेम जायजैसे मृग-जल-जलधि-हिलोरे ॥३॥ लोक विलोकि, पुरान-येद सुनि, समुझि-बूझि गुरुग्यानी। प्रीति-प्रतीति राम-पद-पंकज सकल सुमंगल-स्वानी ॥४॥ अजहुँ जानि जिय, मानि हारि हिय, होह पलक महनीको। सुमिरु सनेह सहित हित रामहि,मानुमतोतुलसीको॥५॥ भावार्थ-यदि परम स्नेही श्रीरामचन्द्रजीके प्रति प्रेम नहीं है तो नर शरीर धारण करनेसे लाभ ही क्या हुआ? ( भगवान्में अनन्यप्रेम होनाहीतो मनुन्य-जीवनका परम लाभ है)॥१॥ जिस शरीरको धारण कर शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष सारे संसारी सुखौंको (विषयत ) त्याग कर श्रीरामजीके प्रेमी बनते हैं। उस (दुर्लभ) शरीरको भी पाकर, अरे महानीच अभागे तूने पेट भर-भरकर पाप ही फिये॥२॥ जगत में ज्ञान, शाय, योग, जप, तर, यज्ञ आटिं आनन्द (मोक्ष) केमागौकी कमी नाही है किन्तु विना श्रीरामजीके प्रमके ये सारे साधन वैसेही