पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३१०

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- विनय-पत्रिका जैसे मृगतृष्णाके समुद्रकी लहरें॥ ३॥ ससारको देखकर, पुराणों और वेदोको सुनकर तथा ज्ञानी गुरुजनोंसे समझ-बूझकर श्रीरामजीके चरणारविन्दों में प्रेम और विश्वास करना ही समस्त कल्याणोंकी खानि है ॥४॥ यदि अब भी तूने मनमें समझ लिया और अपने हृदयमें हार मान ली, (अभिमान छोड़कर शरण हो गया) तो एक क्षणमें ही तेरा कल्याण हो जायगा । प्रेमपूर्वक (सच्चे ) हितकारी श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण कर, तुलसीदासका यह सिद्धान्त मान ले ॥५॥ [१९५] वलि जाउँ हो राम गुसाई । कीजै कृपा आपनी नाई ॥१॥ परमारथ सुरपुर-साधन सव खारथ सुखद भलाई। कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई ॥२॥ जहँ जहँ चित चितवत हित,तह नित नव विपाद अधिकाई। रुचि-भावती भभरि भागहि समुहाहिं अमित अनभाई ॥३॥ आधि-मगन-मन, व्याधि-विकल-तन, वचन मलीन झुठाई। एतेहुँ पर तुमसों तुलसीकी प्रभु सकल सनेह सगाई ॥४॥ भावार्थ-हे मेरे नाथ श्रीरामजी ! मैं आपपर बलि जता हूँ। आप अपने खभावसे ही मुझपर कृपा कीजिये ॥१॥ परमार्थके, वर्गके तथा सांसारिक स्वार्थ के सुख देनेवाले और कल्याणकारक जितने (शम, दम, तम, यज्ञ आदि ) उपाय हैं, उन सबकी रीतियों को कलियुगने क्रोध करके लुप्त कर दिया है, और अपनी ( दम्भ-कपट-निन्दा आदि) दुखदायक कुचालोंको चला दिया है ॥ २ ॥ जहाँ-जहाँ यह मन अपना हित देखना है,वहीं नित्य नये दुःख बढ़ते ही जाते हैं । रुचिको अच्छी लगनेवाली बातें दूरसे ही डरकर भाग जाती हैं और जिनको मन