पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३२८

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- - ३३३ विनय-पत्रिका मोह, अभिमान एवं राग और द्वेषको बिल्कुल ही छोड दे, इनका लेशमात्र भी न रहे ॥ २॥ कानोंसे भगवत्कथा सुन, मुखसे (राम) नाम जपा कर, हृदयमें श्रीहरिका ध्यान किया कर, मस्तकसे प्रणाम तथा हार्थोसे भगवान्की सेवा किया कर । नेत्रोंसे कृपासागर चराचर विश्वमय महाराज जानकीवल्लभ रामचन्द्रजीके दर्शन किया कर ॥ ३॥ यही भक्ति है, यही वैराग्य है, यही ज्ञान है और इसीसे भगवान् प्रसन्न होते हैं, अतएव तू इसी शुभ व्रतका आचरण कर । हे तुलसीदास ! यही शिवजीका बतलाया हुआ मार्ग है। इस (कल्याणमय) मार्गपर चलनेसे स्वप्नमे भी भय नहीं रहता ( मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर अभय हो जाता है)॥४॥ [२०६] नाहिन और कोडसरन लायक दूजोश्रीरघुपति-समविपति निवारन काकोसहजसुभाउ सेवक बसकाहि प्रनतपर प्रीति अकारन ॥१॥ जन गुन अलपगनत सुमेरुकरि, अवगुन कोटि विलोकि विसारन । परम कृपालु,भगत-चिंतामनि, विरदपुनीत, पतितजनतारन ॥२॥ सुमिरत-सुलभ दास-दुख सुनिहरि चलत तुरता पटपीत सँभारन साखि पुरान-निगम-आगम सब जानतद्रुपद-सुताअरुवारन ॥३॥ जाको जस गावत कवि-कोबिद, जिन्हके लोभ-मोह मद-भार न । तुलसिदास तजि आस सकलभजु, कोसलपतिमुनिवधू उधारन ॥ भावार्थ-श्रीरघुनाथजीके समान विपत्तियोंको दूर करनेवाला तथा शरण लेने योग्य कोई दूसरा नहीं है। ऐसा किसका सरल खभाव है जो अपने सेवकोंके वशमे रहता हो ? शरणागत भक्तोंपर किसका अहेतुक प्रेम है ? ॥ १ ॥ श्रीरघुनाथजी अपने दासके जरा-