पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३३७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका ३४२ काम आदि दुष्टोंकी जो मण्डली बस रही है, उसे परिवारसहित समूल नष्ट करके क्या आप मेरे असह्य दुःखोंको दूर करेंगे? और क्या आप योग, जप, यज्ञ और विज्ञानकी अपेक्षा निर्मल और अधिक महत्त्व- वाली अपनी भक्तिको देकर मेरे हृदयमें परमानन्द भर देंगे? ॥३॥ यदि आप इस तुलसीदासको नीचोंका शिरोमणि, सब साधनोंसे रहित, कुटिल एवं मलिन मनवाला मानकर अपने मनमें कुछ डरेंगे (कि इतने बड़े पापीका उद्धार करनेसे कदाचित् हमपर लोग अन्यायी- पनका दोषारोपण करें ) तो हे नाथ ! फिर आप अपनी वेदविख्यात विरदावली तथा निर्मल कीर्तिका विस्तार कैसे करेंगे? ( यदि आपको अपने बानेकी लाज है, तो मेरा उद्धार अवश्य ही कीजिये) ॥४॥ राग केदारा [२१२ रघुपति विपति-दवन । परम कृपालु, प्रनत-प्रतिपालक, पतित-पवन ॥ १ ॥ कर, कुटिल, कुलहीन, दीन, अति मलिन जवन । सुमिरत नाम राम पठये सव अपने भवन ॥ २ ॥ गज-पिंगला-अजामिल-से खल गर्न धौ कवन । तुलसिदास प्रभु केहि न दीन्हि गति जानकी-रवन ॥ ३ ॥ भावार्थ-श्रीरघुनाथजी विपत्तियोंको दूर करनेवाले हैं। आप बड़े ही कृपालु, शरणागतोंके प्रतिपालक और पापियोंको पवित्र करनेवाले है॥१॥निर्दयी, दुष्ट, नीच जाति, गरीव, बड़े ही मलिन म्लेच्छतकको का स्मरण करते ही आपने अपने परमधामको भेज दिया ॥२॥ गजेन्द्र, पिंगला वेश्या, अजामिल आदि (विपयोंमें मतवाले) दुष्टोंको कौन