पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३४४

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विनय-पत्रिका - किसका नाम है? और महापापी अजामिलको (पुत्रके धोखेसे आपका नारायण-नाम लेनपर मिसने अपना परम धाम दे दिया ? (ऐसे एक आप ही है और कोई नहीं है ) ॥ २ ॥ शिव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि अनेक लोकपाल च; पर गोफस्पी नदीमें इबते हुए गजगजयो किसीन भी नहीं बचाया ( आपहीको गरुड छोडकर दोइना पड़ा) ॥३॥ जब बहुत-से राजाओंकी सभामें (नरके अवतार ) अर्जुनकी खी द्रौपदीने (दु गासनद्वारा सताये जानेपर ) कहा कि 'हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये?--उस समय वहाँ समी समर्थ थे, पर किसीने उसे वस्त्र नहीं दिया (आपने ही वस्त्रावतार धारणकर उस अबलाकी लाज रक्खी ) ॥ ४ ॥ हे करुणासागर ! आप करणा-समुद्रक करुणापूर्ण गुणोंकी कथाएँ एक मुंहसे कैसे कहूँ ! हे कोशलाधीश ! आपने भक्तोंके लिये अवतार धारणकर क्या-क्या नहीं किया ? ( भक्तोंके हितके लिये सभी कुछ किया ) ॥ ५॥ यदि आप मुझसे बहुत ही घिनाते हैं, तो मुझे किसी ऐसेके हाय सपि दीजिये जो आपके ही समान हो, ( नहीं तो ) यह तुलसीदास और किसी तरह भी आपके चरणोंको छोडकर क्यों जाने लगा ? भाव यह कि मैं तो आपहीके चरणोंकी शरणमें रहुँगा ॥६॥ [२१८] कहिं देखाइहो हरि चरन । समन सकल कलेस कलि-मल, सकल मंगल-करन ॥१॥ सरद-भव सुंदर तरनतर अरुनचारिज-वरन । लच्छि-लालित ललित करतल छवि अनूपम धरन ॥२॥ गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु बलि-छरन ।