पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३४७

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विनय पत्रिका सच्चा मोक्षरूप सुख बिना भगवत्कृपा हुए मिलता नहीं) जैसी कि कोढ़की खाज (जिसे खुजलाते समय सुख मिलता है, पर पीछे मवाद निकलनेपर जलन पैदा हो जाती है। उसीके समान इन्द्रियोंके साथ विषयका संयोग होनेपर आरम्भमें तो सुख भासता है, परन्तु परिणाममें महादुःख होता है। इसलिये विषय केवल दुःखदायी ही हैं, इसी बातको समझकर मैंने किसी भी उद्यममें मन नहीं लगाया)॥२॥ मैंने हृदयमें डरकर कृपाल संत-समाजसे पूछा कि कहिये, मुझ-सरीखे (उधमहीन) को भी कोई शरणमें लेगा ? संतोंने ( एक खरसे ) यही उत्तर दिया कि एक कोशलपति महाराज श्रीरामचन्द्रजी ही (ऐसोंको शरणमें) रख सकते है ॥ ३ ॥ हे कृपाके समुद्र ! आपको छोडकर दीनता और दरिद्रताका नाश कौन कर सकता है ? हे दशरथनन्दन ! दानियोका बाना रखनेवालोंमें आप श्रेष्ठ हैं ॥ ४॥ हे गरीवनिवाज ! मैं जन्मका भूखा गरीव भिखमंगा हूँ। बस, अब इस तुलसीको भक्तिरूपी अमृतके समान सुन्दर भोजन पेटभर खिला दीजिये ( अपने चरणों में ऐसीभक्ति दे दीजिये कि फिर दूसरी कोई कामना ही न रह जाय ) ॥ ५॥ [२२०] करिय सॅभार, कोसलराय! और ठौर न और गति, अवलंब नाम विहाय ॥१॥ वझि अपनी आपनो हितु आप चाप न माय । राम! राउर नाम गुर, सुर, स्वामि, सखा, सहाय ॥२॥ रामराज न चले मानस-मलिनके छल छाय। कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घालत घाय ॥३॥