पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३४९

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विनय-पत्रिका के कपटकी छाया भी नहीं पड़ सकती; किन्तु यह कायर कलिकाल उसी क्रोधके कारण मुझ मरे हुएको भी अपनी चोटोंसे घायल कर रहा है । (इसे इतना भी तो भय नहीं कि मैं राम राज्य में बस रहा हूँ)॥३॥ जैसे गीदड मेढकको मारकर सिंहके वेरका बदला लेना चाहता है, वैसे ही यह मुझे आपका दास जानकर मुझपर गहरी चोट कर रहा है ( दुःख तो इसको आपसे है, क्योकि जिसका मन आपके राज्यमें बसता है, उसमें यह प्रवेश नहीं कर पाता; परन्तु आपपर तो इसका जोर चलता नहीं, मुझ-सरीखे क्षुद्र दासको सता रहा है )॥ ४॥ भगवान्के परमधाममें आनन्दपूर्वक निवास करनेवाले महाराज परीक्षितके मनमे भी इसकी कपटभरी करसूतों, असंख्य अनीतियों और (साधुओंके मार्गमें डाले गये) अनेक विघ्न-बाधाओंको सुनकर पछतावा हो रहा है (इसीलिये कि इसे पकड़करहमने क्यों जीता छोड़ दिया १ ) ॥५॥ हे कृपासागर! तनिक कृपादृष्टि कीजिये जिससे इस दासके मनकी पीड़ा शान्त हो जाय । हे.दीनदयालो! हे देव ! मैं आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिये आपकी शरण आया हूँ॥ ६॥ यदि आप ( दयावश) उस (कलियुग) को पास बुलाकर रोकना नहीं चाहते या उसकी हाय-हाय की पुकार सुनकर उसे मारना नहीं चाहते, तो मैं आपकी बलैया लेता हूँ ( आप तनिक हनुमान्जीको ही संकेत कर दीजिये, आपका इशारा पाकर ) वे इसकी ओर वैसे ही देखेंगे, जैसे सिंह गायके मुखकी ओर देखता है ॥७॥ (इस प्रकार कलियुगकी कुटिल करनीके कारण ) जब हनुमान्जी लाल मुह, टेढ़ी भौहें और पीली आँखोंको क्रोधसे लाल कर लेंगे, तब पवनकुमार वीरवर हनुमानजीका