पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३७

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विनय पत्रिका
३८
 
[ २० ]

ईस-सीस बससि, त्रिपथ लससि,नम-पताल-धरनि । सुर-नर-मुनि-नाग-सिद्ध-सुजन मगल-करनि ॥१॥ देखत दुख-दोष-दुरित-दाह-दारिद-दरनि । सगर-सुवन साँसति-समनि, जलनिधि जल भरनि ॥२॥ महिमाकी अवधि करसि बहु विधि-हरि-हरनि । तुलसी करु वानि विमल, बिमल वारि वरनि ॥ ३॥ भावार्थ-हे गङ्गाजी ! तुम शिवजीके सिरपर विराजती हो, आकाश, पाताल और पृथ्वी-इन तीनों मार्गोंसे बहती हुई शोभायमान होती हो । देवता, मनुष्य, मुनि, नाग, सिद्ध और सज्जनोंका तुम कल्याण करती हो ॥ १ ॥ तुम देखते ही दु.ख, दोष, पाप, ताप और दरिद्रताका नाश कर देती हो । तुमने सगरके साठ हजार पुत्रोंको यम-यातनासे छुडा दिया । जलनिधि समुद्रमें तुम सदा जल भरा करती हो ॥ २ ॥ ब्रह्माके कमण्डलुमें रहकर, विष्णुके चरणसे निकलकर और शिवजीके मस्तकपर विराजकर तुम्हींने तीनोंकी महिमा वदा रक्खी है । हे गङ्गाजी ! जैसा तुम्हारा निर्मल पापनाशक जल है, तुलसीदासकी वाणीको भी वैसी ही निर्मल बना दो, जिससे वह सर्वपापनाशक रामचरितका गान कर सके ॥ ३ ॥

यमुना-स्तुति
राग बिलावल
[२१]

जमुना ज्यों ज्यों लागी वादन । त्यो त्यो सुरुत-सुभट कलि-भूपहिनिदरि लगे वहु काढ़न ॥१॥