पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३७३

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विनय-पत्रिका ३७८ का दीक्षित था, जिसके एक बार याद करते ही आप अपने वाहन गरुडको छोड़कर सुदर्शनचक्र लिये दौडे आये ? ॥ २॥ देवता, मुनि और ब्राह्मणोंके ऊँचे कुलको छोडकर आपने गोकुलमें एक गोप ( नन्दजी) के घरमें जन्म लिया । कौरवपति राजा दुर्योधनके ऐश्वर्यको ठुकराकर आपने (दीन ) विदुरके घर जाकर (साग- भाजीका ) भोजन किया ॥ ३ ॥ भगवान् अपने अनन्यप्रेमी भक्तों- के साथ बहुत भला मानते हैं । इस अनन्य प्रेम-भक्तिकी रीति कुछ. कुछ अपने अर्जुनको बतायी थी। हे तुलसीदास ! श्रीरामजी तो सरल स्वाभाविक विशुद्ध प्रेमके अधीन हैं, दूसरे जितने साधन हैं वे ऐसे है, जैसे पानीकी चिकनाई । (पानी पडनेपर थोडी देरके लिये शरीर विकना-सा मालूम होता है, पर सूखनेपर फिर ज्यों-का- त्यों रूखा हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे साधनोंसे कामनाकी पूर्ति होनेपर क्षणिक सुख तो मिलता है, परन्तु दूसरी कामना उत्पन्न होते ही मिट जाता है)॥४॥ [२४१] तब तुम मोहसे सठनिको हठि गति न देते। कैसेह नाम लेइ कोउ पामर, सुनि सादर आगे कै लेते ॥ १॥ पा-खानि जिय जानि अजामिल जमगन तमकि तये ताको भेते । लियो छुड़ाइ, चले कर मीजत, पीसत दॉत गये रिसते ॥२॥ गौतम-तिय,गजा गीध, विटप, कपि, है नाहि नीके मालमजते । मिन्ह तिन्ह काजनि... तिन्हके काजलाधु-समाजु तजि कृपासिंध अजह अधिक आदर येहि द्वारे, पतित पुनीत होत नाहि केले। मेरे पासंगहु न पूजिहै, द्वै गये, है, होने खल जेते ॥४॥