पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३८

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विनय-पत्रिका ज्योज्योजल मलीन त्योंत्योजमगन मुख मलीन लहै आदन। तुलसिदास जगदध जवास ज्यों अनघमेघ लगे डाढन ॥२॥ भावार्थ-यमुनाजी ज्यों-ज्यों बढ़ने लगी, त्यों-त्यों पुण्यरूपी योद्धागण कलियुगरूपी राजाका निरादर करते हुए उसे निकालने लगे ॥ १ ॥ बरसातमें यमुनाजीका जल बढ़कर ज्यों-ज्यों मैला होने लगा, त्यों-त्यों यमदूतोंका मुख भी काला होता गया । अन्तमें उन्हें कोई भी आसरा नहीं रहा, अब वे किसको यमलोकमे ले जाय ? तुलसीदास कहते हैं कि यमुनाजीके बढते ही पुण्यरूपी मेघने संसारके पापरूपी जवासेको जलाकर भस्म कर डाला ॥ २ ॥ काशी-स्तुति राग भैरव [२२] सेइय सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी। समनि सोक-संताप-पाप-रुज सकल-सुमंगल-रासी ॥१॥ मरजादा चहुँ ओर चरनवर, सेवत सुरपुर-चासी। तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अविनासी ॥ २॥ अंतरऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ वेद-विस्वासी। गलकंवल वरुना विभाति जनु, लूम लसति सरिताऽसी ॥३॥ दंडपानि भैरव विषान मलरुचि-खलगन-भयदा-सी । लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी ॥४॥ मनिकर्णिका बदन-ससि सुंदर, सुरसरि-सुख सुखमा-सी। . स्वारथ परमारथ परिपूरन. पंचकोसि महिमा-सी ॥ ५