पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३८७

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विनय-पत्रिका "३९२ कल्पवृक्ष हैं। इसी कल्पवृक्षकी छायामें मैं रहना चाहता हूँ। बलिहारी ! यह तुलसी कलियुगके कुटिल धर्मोंसे बड़ा ही व्याकुल हो रहा है। ( कृपाकर इसे शीघ्र ही बचाइये) ॥ ४ ॥ [२५०] तौ हौं वार वार प्रभुहि पुकारिकै खिझावतो न, जो पै मोको होतो कहूँ ठाकुरल्ठहरु । आलसी अभागे मोसे तैं कृपालु पाले पोसे, राजा मेरे राजाराम, अवध सहरु ॥१॥ सेये न दिगीस, न दिनेस, न गनेस, गौरी, हित के न माने विधि हरिउ न हरु । रामनाम ही सो जोग-छेम, नेम, प्रेम-पन, सुधा सो भरोसो एह, दूसरो जहरु ॥२॥ समाचार साथके अनाथ-नाथ ! कासों कहीं, नाथ ही के हाथ सव चोरऊ पहरु । निज काज, सुरकाज, आरतके काज, राज! वूझिये विलंब कहा कहूँ न गहरु ॥३॥. रीति सुनि रावरी प्रतीति-प्रीति रावरे सो, डरत हौं देखि कलिकालको 'कहरु। कहेही बनेगी के कहाये, बलि जाउँ, राम, 'तुलसी ! तू मेरो, हारि हिये न हहरु' ॥ ४॥ • भावार्थ-हे नाथ ! यदि मुझे कहीं कोई दूसरा खामी या ( आश्रय- के लिये ) स्थान मिल जाता, तो मैं बार-बार आपको पुकारकर अप्रसन्न न करता । हे महाराज रामचन्द्रजी ' मुझ-सरीखे आलसियों