पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३९६

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विनय-पत्रिका नामसो निवाह नेह, दीनको दयालु ! देहु, दासतुलसीको, बलि, वड़ो वरु है ॥४॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी ! साधुओंके लिये तो आपका नाम कल्पवृक्ष है, क्योंकि स्मरण करते ही वह तीनों ( दैहिक, भौतिक और दैविक ) तापोंको हर लेता है और सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है, मनुष्यको पूर्णकाम बना देता है। ( वह आपका नाम ) समस्त पुण्यरूपी कमलोंका सरोवर है ( राम-नामका आश्रय लेनेवालेको सभी पुण्योंका फल मिल जाता है)॥१॥ वह लाभका भी लाभ, सुखका भी सुख है और ( भक्तोंका) सर्वख है। ( उससे बढ़कर सतोंका कोई लाभ, सुख या धन नहीं है। वह पतितोंको पावन करनेवाला और (सबको डरानेवाले यमदतरूपी महान् ) भयको भी भयभीत करनेवाला है। वह नीच-ऊँच और राव-रंक, सभीके लिये सुलभ है (सभी उसका जप कर सकते हैं। सभीको सुख देनेवाला है और अपने निजी घरके समान आराम देनेवाला है ॥ २॥ वेदोने, पुराणोंने और शिवजीने भी पुकार-पुकारकर कहा है कि राम-नाममें प्रेम होना ही चारों ( अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ) फलोंका फल है। एस श्रीराम-नामपर जिसके मनमें प्रेम और विश्वास नहीं है, मेरी समझमे उस मनुष्यको गधा समझना चाहिये ( वह गधेके समान जीवनमें मनुष्यत्वके अहकारका भार ही ढोता है)।॥ ३॥ पिता- माता, मित्र-हिद,भाई-गुरु और मालिक-इनमेंसे कोई भी श्रीराम-नामके समान नहीं है। वह परम सुशील सुधाकर (चन्द्रमा) के समान अधिमान् खामी है (शरण लेते ही समस्त ताप हर लेता है और लप अमृत पान कराकर सदाके लिये सुखी कर देता है)। वि० ५०२६-