पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४०५

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"विनय-पत्रिका शरण लेकर ) सुखमार्गपर अच्छी चाल चलकर अपना कल्याण नहीं चाहता हूँ। और यहाँ ( आपकी शरणमें ) मैं आदर न पाकर भी अच्छी तरह हूँ ( आपके अनोखे विरदके भरोसे निर्भय और निश्चिन्त पड़ा हूँ)। तुलसीने समझकर अपने मनको बार-बार समझा दिया है और वह अपने नाथसे भी कहकर निश्चिन्त हो गया है कि उसका निर्वाह आपके ही हाथमें है ।। ४ । । [२६१] मेरी न बनै बनाये मेरे कोटि कलप लौं राम ! रावरे बनाये बने पल पाउ मैं। निपट सयाने हो कृपानिधान ! कहा कहाँ १ . । लिये घेर वदलि अमोल मनि आउ मैं ॥१॥ मानस मलीन, करतब कलिमल पीन । जीह हून जग्यो नाम, बक्यो आउ-बाउ मैं। कुपथ कुचाल चल्यो, भयो न भूलिहू भलो, वाल-दसा हू न खेल्यो खेलत सुदाउ मैं ॥२॥ देखा-देखी दंभ ते कि संग ते भई भलाई, - प्रकटि जनाई, कियो दुरित-दुराउ मैं। दोषपोष, गोगन समेत मन । इनकी भगति कीन्ही इनही को भाउ मैं ॥ ३ ॥ आगिली-पाछिली, अवहूँको अनुमान ही ते । झियत गति, कछु कीन्हो तो न काउ मैं। जग कहै रामकी प्रतीति-प्रीति तुलसी हू,... । झूठे-साँचे आसरो साहब रघुराउ मैं ॥४