पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४१४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका [२६६] ज्यों ज्यों निकट भयो चहौं कृपालु !त्यों-त्यों दूरि परयो हो। तुम चहुँ जुगरस एक राम हौ हूँ रावरो, जदपि अघ अवगुननि भरयो हो॥१॥ ____बीच पाइ एहि नीच बीच ही छरनि छरयो हौं । - हौ सुवरन कुवरन कियो, नृपते भिखारि करि, सुमतिते कुमति करयो हो ॥२॥ __ अगनित गिरि-कानन फिरयो, बिनु आगि जरयो हो। चित्रकूट गये हाँ लखि कलिकी कुचालि सब, अब अपडरनि डरयो हौं ॥३॥ माथ नाइ नाथ सो कहाँ, हाथ जोरि खरयो हौं। चीन्हो चोर जिय मारिहै तुलसी सो कथा सुनि प्रभुसो गुदरि निवरयो हौं ॥ भावार्थ-हे कृपानिधान ! ज्यों-ज्यों मैं आपके निकट होना चाहता हूँ त्यों-ही-त्यों दूर होता चला जाता हूँ। हे रामजी ! आप चारों युगोंमें सदा एकरस हैं और मैं भी आपका रहा आया हूँ, यद्यपि मैं पापों और अवगुणोंसे भरा हूँ॥ १ ॥ आपसे अलग रहने- का मौका पाकर इस नीच कलियुगने मुझे बीचहीमे छलोंसे छल लिया ( अज्ञानसे ही इसको जीवत्व प्राप्त हो गया)। मैं सुवर्ण था, पर उसने कुवर्ण कर दिया (नित्य आनन्दधनरूपसे दुःखग्रस्त जीवरूपमें परिणत कर दिया ) । राजासे रंक बना डाला और ज्ञानीसे अज्ञानी कर डाला ॥२॥ तबसे मैं ( अनेक योनियोंमें ) अगणित पहाड़ों और जंगलोंमें भटकता रहा और बिना ही आगके ( अज्ञानजनित