पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४२

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- ४३ विनय-पत्रिका यह मायाके तीनों गुण, काल और कर्मसे रहित सदा एकरस है, अर्थात् इसके सेवन करनेवाले माया, काल और कर्मके बन्धनसे छूट जाते हैं, क्योंकि कृपालु सीता, राम और लक्ष्मण इसके रक्षक हैं ॥ ८॥ हे तुलसीदास ! जो तू श्रीरामजीके चरणों में प्रेम चाहता है तो चित्रकूट-पर्वतका निश्छल नियमपूर्वक सेवन कर ॥ ९ ॥ राग कान्हरा [२४] अव चित चेति चित्रकूटहि चलु । कोपितकलि,लोपित मंगल मगु,विलसत बढ़त मोह-माया-भलु॥१॥ भूमि विलोकुराम-पद-अंकित, वन विलोकुरघुवर-विहारथलु। सैल-रंग भवभंग-हेतु लखु, दलन कपट-पाखंड-दंभ-दलु ॥२॥ जहँ जनमेजग-जनक जगतपति,विधि-हरि-हर परिहरिप्रपंच छलु । सकृतप्रवेसकरत जेहि आश्रम,विगत-विषादभयेपारथ नलु ॥३॥ नकरु विलंवबिचारुचारुमति, वरष पाछिले सम अगिले पलु। मंत्र सोजाइजपहि,जोजपिभे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु।४॥ रामनाम-जप जाग करत नित, मन्जत पय पावन पीवत जलु । करिहै राम भावतो मनको, सुख-साधन, अनयास महाफलु ॥५॥ कामदमनिकामता, कलपतरु सो जुग जुग जागत जगतीतलु । तुलसी तोहि विसेपि वृझिये, एक प्रतीति-प्रीति एकै वलु ॥६॥ भावार्थ-हे चित्त !अब तो चेतकर चित्रकूटको चल । कलियुगने क्रोध कर धर्म और ईश्वरभक्तिरूप कल्याणके मार्गोका लोप कर दिया है, मोह, माया और पापोंकी नित्य वृद्धि हो रही है ॥१॥