पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४३३

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विनय-पत्रिका ४३८ फिर नाना प्रकारके अत्याचार करने लगे। उनके उपद्रवसे सारा विश्व काँप उठा और देवतालोग पीडित हो उठे। अन्तमें सोने मिलकर विष्णुभगवान्की अध्यक्षतामे भगवान् शङ्करका स्तवन किया। शिवजी शीघ्र प्रकट हुए और एक ही वाणमें तीनों पुरोका विध्वस कर तीनों राक्षसोंका नाश किया । तबसे इनका नाम त्रिपुरारि' पड़ा। काशी-मुक्ति- काशीमें मृत्यु-समय जीवमात्रको श्रीशङ्कर राम-नाम' का मन्त्र देते हैं, जिससे उनकी मुक्ति हो जाती है। काम-रिपु (मदन-दहन )- सती-दाहके पश्चात् भगवान् शङ्कर हिमालय पर्वतके प्रान्तरम एक निर्जन स्थानमें समाधिमग्न हो गये। उसी समय सतीने पार्वतीक रूपमें हिमाचल नामक पर्वतराजके घर जन्म लिया । उधर तारकासुरके अत्याचारके मारे समस्त देवताओंके साथ इन्द्रके नाकोंदम आ गया । तारकासुरके वधके विषयमें यह निश्चय था कि यह महादेवके पुत्रक द्वारा मारा जायगा । परन्तु भगवान् शङ्कर समाधिमग्नथे। इसलिये उन्हें बडी चिन्ता हुई। क्योंकि तारकासुरका अत्याचार असह्य हो रहा था । अतः उन्होंने कामदेवको महादेव का ध्यान तोड़नेके लिये भेजा। इधर पार्वती, किशोरावस्थाको प्राप्त हो तथा नारदमुनिके मुखसे यह भविष्यवाणी सुनकर कि भूतभावन महादेव ही उसके पति होंगे, नित्य उसी हिमालय पर्वतपर ध्यानावस्थित शङ्करकी पूजा करने जाती थी। एक दिन जैसे ही पार्चती श्रीशङ्करके चरणोंमें सुमन-अध्ये दे रही थी कि कामदेव अपने सहचर वसन्तको लेकर पहुंचा । उसने पुणवाणको चढ़ाकर चाहा कि भगवान् शङ्करको निशाना बनावे कि