पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४५८

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४६३ परिशिष्ट मुनिकी स्त्री बन जायगी तो मेरी जीविका ही जाती रहेगी। इसलिये यदि आप पार जाना चाहते हैं तो पहले अपना पैर धोने दीजिये ।" निषादकी भक्ति अपूर्व थी। उसकी भक्तिके ही कारण भगवान्ने उससे अपने चरण धुलाकर कृतार्थ किया । शवरी- यह जातिकी भीलनी थी। मतग ऋषिकी सेवा करते-करते इसे भगवद्भक्तिकी प्राप्ति हो गयी थी । सीताहरणके पश्चात् जब लक्ष्मणजीके साथ भगवान् सीताकी खोजमें वनमें भटक रहे थे तो रास्तेमें भीलनीका आश्रम मिला । उसने भगवान्का वडा सत्कार किया तथा प्रेममे बेसुध होकर भगवान्को पहलेसे चख-चखकर देखे हुए पेड़ोंके सुन्दर बेर दिये और भक्तवत्सल भगवान्ने उन्हे ससह- सराहकर खाया । यह कथा प्रसिद्ध ही है। गोपिका- गोपियोंकी प्रेमाभक्ति प्रसिद्ध है। भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमके वशीभूत हो गोपियों के साथ रास किया था। विदुर- विदुर दासी-पुत्र थे, परन्तु श्रीकृष्ण भगवान्में इनकी अपूर्व भक्ति थी। इसी कारण भगवान् जब हस्तिनापुर गये तो दुर्योधनके घर न जाकर विदुरके आतिथ्यको ही उन्होंने खीकार किया। जब भगवान् विदुरके घर पहुंचे उस समय विदुर घरपर नहीं थे। उनकी पत्नीने भगवान्का सत्कार किया । वह केले लेकर भगवान्को खिलाने बैठी; परन्तु प्रेममें इतनी बेसुध थी कि केले