पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४५९

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४६४ विनय-पत्रिका छीलकर नीचे गिराती गयी और छिलके भगवान्के हायमें । प्रेमके भिखारी भक्तहियहारी प्रभु उन्हीं छिलकोंको भोग लगाने लगे। भगवान्ने विदुरके कुल-शीलका विचार न कर उनकी भक्तिको ही प्रधानता दी । विदुरके साथ भगवान्का सत्यप्रेम था। कुवरी- यह कसकी दासी थी । जव श्रीकृष्ण भगवान् मथुरामें कंसके दरवारमें जा रहे थे तो वह रास्तेमें कंसके लिये चन्दनका अवलेप लिये जा रही थी। भगवान् श्रीकृष्णकी वह परम भक्त थी । भगवान्ने उसके प्रेमके कारण उसके उस चन्दनके अवलेपको अपने शरीरमे लगाया और उसके कुबड़ेपनको दूर कर दिया । कंसको मारकर लौटनेपर भगवानने इसके आतिथ्यको स्वीकार किया था । १२८ रक्तवीज- यह एक महाप्रतापी दैत्य था, इसने घोर तपस्या करके श्रीशिवजीसे यह वरदान प्राप्त किया था कि मेरे शरीरसे जो एक बूंद रक्त गिरे तो उससे सहस्रों रक्तबीज पैदा हों ।' इस वरको प्राप्तकर इसने त्रिलोकीको भयसे कम्पित कर दिया था। सब देवताओंने अन्तमें मिलकर भगवती महाकालीकी स्तुति की । महाकाली प्रकट होकर रक्तबीजसे युद्ध करने लगी । परन्तु जब उसके एक बूंदसे सहस्रों रक्तवीज पैदा होने लगे तो महाकालीने अपनी जीभ इतनी लंबी बढ़ायी कि जितना रक्त उन रक्तबीज दैत्योंके बदनसे गिरता उसे ऊपर ही चाट जाती। इस प्रकार रक्तबीजका सहार उन्होंने किया । यह कथा दुर्गासप्तशतीमें विस्तार पूर्वक दी गयी है।